
अब षड्यंत्र करने वालों को वाकई मिर्ची लगनी ही थी—क्योंकि खेल उन्हीं का था, और धामी ने उसका स्कोरबोर्ड ही पलट दिया। जो लोग प्रदेश के युवाओं की भावनाओं से खेल रहे थे, उनके लिए यह फैसला किसी पटाखे से कम नहीं। फर्क बस इतना है कि अब पटाखे घरों के बाहर नहीं, बल्कि उन साजिशों के ऊपर फूट रहे हैं जो उत्तराखंड की ईमानदार छवि को धूमिल करने में लगी थीं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे सिर्फ पद पर नहीं, प्रण पर चलते हैं। भर्ती परीक्षा रद्द करना आसान फैसला नहीं था—लेकिन यह वही कदम था जो युवाओं के मन में सरकार के प्रति भरोसे की लौ जलाए रखता है। बेरोजगार संघ का आभार जताना भी कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि इस बात की पुष्टि है कि धामी ने सियासत नहीं, संवेदना से काम किया।
विरोधियों के लिए यह शायद सबसे मुश्किल समय है—क्योंकि यहाँ विपक्ष की राजनीति “मुद्दों” से नहीं, “मनोबल” से हार रही है। धामी ने युवाओं का दिल जीतकर उस परचम को ऊँचा कर दिया है जिसे कोई झूठा नैरेटिव अब झुका नहीं सकता।
सकारात्मक तंज यही है कि जहाँ बाकी नेता युवाओं से वादे करते हैं, धामी सीधे जवाब देते हैं। नकल और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस कोई जुमला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की नई पहचान बन चुकी है। विरोधियों को अब समझना होगा—ये वही मुख्यमंत्री हैं जो सत्ता की नहीं, विश्वास की राजनीति करते हैं। इसलिए नहीं कि वे मुख्यमंत्री हैं, बल्कि इसलिए कि वे युवाओं के दिलों के मुख्यमंत्री हैं—जिन्होंने साबित कर दिया कि ईमानदारी जब सिस्टम का हिस्सा बनती है, तो साजिशें अपने आप राख हो जाती हैं।








