देहरादून से उठी इनोवेशन की गूंज: यूपीईएस ने बनाई एआई और डेटा इंजीनियरिंग में वैश्विक पहचान

SHARE:

देहरादून की ठंडी हवा में आज टेक्नोलॉजी की गर्माहट घुली हुई है। जहां पहाड़ों की गोद में अकसर लोग शांति खोजते हैं, वहीं यूपीईएस ने इस बार दुनिया के 100 से ज़्यादा देशों से 6,000 से अधिक दिमागों को एक साथ जोड़कर “इनोवेशन की आवाज़” को गूंजा दिया। मशीन लर्निंग और डेटा इंजीनियरिंग की यह कॉन्फ़्रेंस सिर्फ एक शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि यह एलान है कि अब देहरादून सिर्फ पर्यटकों का शहर नहीं—यह टेक्नोलॉजी की राजधानी भी बन रहा है।

यूँ तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर दुनिया भर में बहुत बातें होती हैं, पर यूपीईएस ने यह दिखा दिया कि Artificial के बीच भी Authentic क्या होता है। जब 1690 शोधपत्रों में से केवल 525 को चुना गया, तो यह किसी “कॉन्फ़्रेंस की औपचारिकता” नहीं, बल्कि गुणवत्ता का उत्सव था। और जब वह सब एल्सेवियर जैसे वैश्विक जर्नल में प्रकाशित होंगे, तो यह प्रमाण है कि भारतीय अकादमिक सोच अब नकल नहीं, नेतृत्व कर रही है।

डॉ. बी.के. दास ने जब कहा कि भारत सुपरपावर बनेगा “हमारी आंखों के सामने और हमारे माध्यम से”, तो यह सिर्फ भाषण नहीं था—यह उस आत्मविश्वास की झलक थी, जो यूपीईएस जैसी संस्थाएं देश के शिक्षा क्षेत्र में भर रही हैं। यूपीईएस ने एक विश्वविद्यालय से बढ़कर खुद को एक “रिसर्च रिपब्लिक” की तरह स्थापित किया है, जहां क्लासरूम में पाठ नहीं, भविष्य लिखा जाता है।

तंज तो यह है कि जहां देश के कई विश्वविद्यालय अब भी “सिलेबस अपडेट” करने की बैठकें करते रहते हैं, वहीं यूपीईएस पहले ही जेनरेटिव एआई और क्वांटम कम्प्यूटिंग पर चर्चा कर रहा है। बाकी विश्वविद्यालय जहां ChatGPT को चीटिंग मानते हैं, यूपीईएस उसे सीखने का साथी बना चुका है।

वाइस चांसलर डॉ. राम शर्मा का यह कहना बिल्कुल सही है कि “इंटेलिजेंस और मैटर को साथ काम करना होगा।” क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी मशीनें भी कुछ नहीं कर सकतीं अगर इंसान के भीतर जिज्ञासा की लौ न जले। यूपीईएस ने छात्रों में वही लौ जलाए रखी है—जहां सोच सवाल बनती है और सवाल समाधान।

₹13.5 लाख के सरकारी प्रायोजन और हजारों शोधकर्ताओं की भागीदारी से कहीं अधिक मूल्यवान है वह “वैचारिक निवेश” जो यूपीईएस हर विद्यार्थी में कर रहा है। यह कॉन्फ़्रेंस एक स्पष्ट संदेश देती है—भारत का भविष्य किसी सिलिकॉन वैली में नहीं, बल्कि देहरादून की घाटियों में लिखा जा रहा है, जहाँ पहाड़ भी अब डेटा क्लाउड्स को निहारते हैं।

Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई