उत्तराखंड में षड्यंत्रों का जाल और विकास की टक्कर, दृढ़-संकल्पित, अडिग और अटल धामी सरकार का निर्णायक संघर्ष

SHARE:

राजनीति से मेरा कोई औपचारिक नाता नहीं है, लेकिन लोकतंत्र में जीने वाला कोई भी सजग नागरिक इतना तो समझ ही सकता है की लोकतंत्र में आँख-कान खुले रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। और जब आँखें खुली हों तो यह साफ दिखता है कि उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों जो शोर है, वह किसी अचानक उपजी संवेदना का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरी, सुनियोजित और दीर्घकालिक साजिश का हिस्सा है। लक्ष्य बहुत स्पष्ट है पुष्कर सिंह धामी की सरकार को कमजोर दिखाना, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करना और 2027 से पहले माहौल को ज़हर से भर देना।
धामी कोई संयोग से मुख्यमंत्री नहीं हैं। वह एक धावक की तरह हैं लगातार आगे बढ़ते हुए, बिना पीछे देखे, बिना शोर मचाए। अडिग, अटल और दृढ़ संकल्प के साथ। यही बात उन लोगों को सबसे ज़्यादा चुभती है जो राजनीति को सिर्फ बयान, अफवाह और भीड़ भड़काने का औजार समझते हैं। जब सरकार काम करती है, फैसले लेती है और बिना भेदभाव के कानून लागू करती है, तब विरोध के पास मुद्दे नहीं बचते। और जब मुद्दे नहीं बचते, तब साजिश जन्म लेती है।
जरा पैटर्न देखिए। पहले एक हिस्ट्रीशीटर गैंग अचानक सोशल मीडिया और ज़मीनी स्तर पर सक्रिय होता है। फिर कांग्रेस का वही घिसा-पिटा राग शुरू होता है। उसके बाद कुछ ऐसी महिला चेहरे सामने लाए जाते हैं, जिनकी पहचान राजनीति में शालीनता से नहीं, बल्कि उत्तेजना और सनसनी से रही है। यह सब एक साथ यूँ ही नहीं होता। यह वह रणनीति है जिसमें सच से ज़्यादा शोर पैदा किया जाता है, ताकि जनता भ्रमित रहे।
अंकिता भंडारी का मामला बेहद संवेदनशील और दुखद है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस मामले को सच में न्याय के लिए उठाया जा रहा है, या इसे सत्ता हासिल करने की सीढ़ी बनाया जा रहा है? जिस तरह की भाषा, जिस तरह के आरोप और जिस तरह की असंवेदनशील बयानबाज़ी की जा रही है, वह न्याय की लड़ाई नहीं हो सकती। यह तो पीड़ा का अपमान है। सच्चाई यह है कि कुछ लोग अंकिता के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, न कि अंकिता के लिए न्याय।
धामी सरकार की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह दबाव में नहीं आती। न सड़क के शोर से, न सोशल मीडिया के ट्रेंड से, न ही राजनीतिक ब्लैकमेलिंग से। कानून ने जो रास्ता तय किया है, सरकार उसी पर चल रही है। जांच एजेंसियां काम कर रही हैं, न्यायालय अपना दायित्व निभा रहे हैं और सरकार ने कभी भी जांच से भागने की कोशिश नहीं की। पारदर्शिता कोई नारा नहीं, बल्कि धामी की कार्यशैली का हिस्सा है।
यही वजह है कि धामी आज उन लोगों की आंखों की किरकिरी बन चुके हैं जिनकी राजनीति सत्ता में रहते हुए भी दिशाहीन रही। नकल माफियाओं पर चोट हो, अपराधियों पर बुलडोज़र चले, भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती हो या फिर समान नागरिक संहिता जैसा ऐतिहासिक फैसला—इन सबने यह साबित कर दिया कि धामी सरकार फैसले लेने से नहीं डरती। और जो सरकार फैसले लेती है, उसे बदनाम करने की कोशिशें स्वाभाविक होती हैं।
असल में यह लड़ाई सरकार बनाम विपक्ष की नहीं है। यह लड़ाई काम बनाम शोर की है। एक तरफ धामी हैं, जो चुपचाप दौड़ रहे हैं, परिणाम दे रहे हैं, राज्य को दिशा दे रहे हैं। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो मंच, कैमरा और बयान के बिना अपनी राजनीति की कल्पना नहीं कर सकते। उनके पास न भविष्य का रोडमैप है, न विकास का विज़न, इसलिए वे अतीत की राख कुरेद रहे हैं।
आम आदमी शायद अभी पूरे खेल की गहराई न समझ पा रहा हो, लेकिन जनता सब देख रही है। वह देख रही है कि कौन अडिग खड़ा है और कौन सिर्फ गिराने की साजिश रच रहा है। इतिहास गवाह है कि जो सरकारें दृढ़ संकल्प के साथ चलती हैं, उन्हें गिराने की साजिशें अंततः उन्हीं साजिशकर्ताओं पर भारी पड़ती हैं। धामी आज सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उस राजनीति का प्रतीक बन चुके हैं जो काम से जवाब देती है, शोर से नहीं। और यही बात आने वाले समय में सबसे बड़ा फैसला करेगी।

By _ Hitesh Kumar

Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई