
नववर्ष का पहला दिन प्राय,औपचारिक शुभकामनाओं और प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित रह जाता है, लेकिन देहरादून में जिला प्रशासन ने इसे संकल्प और संवेदनशील निर्णय का दिन बनाया। जिलाधिकारी सवीन बंसल के नेतृत्व में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि प्रशासन का दायित्व केवल व्यवस्थाएँ चलाना नहीं, बल्कि उन जीवनों को संभालना भी है जो परिस्थितियों की मार से शिक्षा से कटने की कगार पर खड़े हैं।
नंदा सुनंदा पहल यहाँ एक योजना भर नहीं दिखती, बल्कि डीएम सवीन बंसल की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतिबिंब बनकर सामने आती है। चार बालिकाओं की बाधित शिक्षा को पुनर्जीवित करना कोई आकस्मिक कदम नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है जो मानती है कि गरीबी, बीमारी या पारिवारिक त्रासदी किसी मेधावी के भविष्य का फैसला नहीं कर सकती। आईसीयू में भर्ती पिता, दिव्यांग माता-पिता या पिता की असमय मृत्यु से जूझते परिवार—इन हालातों में अक्सर व्यवस्था चुप हो जाती है, लेकिन यहाँ प्रशासन आगे आया।
यह पहल यह भी दिखाती है कि मजबूत डीएम वही होता है जो फाइलों में दर्ज मामलों को मानवीय संदर्भ में देखे। 11 संस्करणों में 93 बालिकाओं की शिक्षा को सहारा देना इस बात का प्रमाण है कि डीएम बंसल के लिए यह कोई एक दिन की संवेदना नहीं, बल्कि निरंतर प्रशासनिक प्रतिबद्धता है। सकारात्मक तंज़ व्यवस्था पर स्वयं उभरता है जहाँ कई योजनाएँ भाषणों और फोटो तक सिमट जाती हैं, वहीं यहाँ परिणाम बोलते हैं।
डीएम बंसल का नेतृत्व यह भरोसा पैदा करता है कि जिला प्रशासन अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचने का साहस रखता है। यह वही दृढ़ इच्छाशक्ति है जो कहती है कि शिक्षा रुकना सबसे बड़ा अन्याय है और प्रशासन उसे रुकने नहीं देगा। जब नेतृत्व संवेदनशील हो और निर्णय स्पष्ट हों, तब शासन आदेश नहीं, आशा बन जाता है और यही मजबूत डीएम की असली पहचान है।








