
उत्तराखंड की कांग्रेस आज जिस राजनीतिक दौर से गुजर रही है, वह केवल सत्ता से बाहर होने का संकट नहीं है, बल्कि भरोसे के टूटने और नेतृत्व के खोखलेपन का आईना भी है। एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल लगातार सरकार पर हमलावर हैं, बयानबाज़ी में तल्ख़ी है, शब्दों में कड़वाहट है, लेकिन ज़मीन पर वही कड़वाहट अब पार्टी के भीतर ज़हर बनकर फैल चुकी है। फर्क बस इतना है कि सरकार पर हमला भाषणों तक सीमित है, जबकि कांग्रेस पर हमला उसके अपने लोग कर रहे हैं पैरों से, वोट से और पार्टी छोड़कर।
गोदियाल की राजनीति आज “विरोध” तक सिमट चुकी है, “विकल्प” कहीं नज़र नहीं आता। संगठन को जोड़ने, कार्यकर्ताओं को भरोसा देने और नेतृत्व को सामूहिक बनाने की बजाय कांग्रेस एक व्यक्ति-केंद्रित, नाराज़ और प्रतिक्रियात्मक राजनीति में उलझी दिखती है। नतीजा यह है कि कार्यकर्ता खुद को सुना हुआ नहीं, बल्कि इस्तेमाल हुआ महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि कोटद्वार से शुरू हुआ मोहभंग देहरादून, ऋषिकेश, पौड़ी और रुड़की तक फैल चुका है। कांग्रेस की बैठकों से ज़्यादा चर्चा अब भाजपा ज्वाइनिंग की तस्वीरों की है।
यह महज़ “दल-बदल” नहीं है, यह कांग्रेस के संगठनात्मक खोखलेपन पर सीधी मुहर है। जिन पार्षदों, ब्लॉक प्रमुखों और जमीनी कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस छोड़ी, वे कोई बाहर से आए चेहरे नहीं थे, बल्कि वही लोग थे जो संगठन की रीढ़ माने जाते हैं। जब रीढ़ ही जवाब दे दे, तो शरीर का खड़ा रहना मुश्किल हो जाता है। कांग्रेस का ग्राफ इसी वजह से गिर नहीं रहा, फिसल रहा है। और वह भी तेज़ी से।
गणेश गोदियाल के बयानों में जो तल्ख़ी दिखती है, वह अब पार्टी के भीतर असहजता और हाशिए की शक्ल ले चुकी है। नेतृत्व की यह कड़वाहट न तो सत्ता को चुनौती दे पा रही है और न ही संगठन को बचा पा रही है। उलटे, यह संदेश और साफ़ हो रहा है कि कांग्रेस के पास नाराज़गी तो है, लेकिन दिशा नहीं; आरोप तो हैं, लेकिन भरोसा नहीं; रणनीति तो है, लेकिन ज़मीन से जुड़ाव नहीं। यही वजह है कि भाजपा को कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करनी पड़ रही कांग्रेस खुद अपने दरवाज़े खोलकर लोगों को बाहर धकेल रही है।
भाजपा का रुख कर रहे कांग्रेसियों के बयान भी इस सियासी हकीकत को उजागर करते हैं। विकास, स्पष्ट नीति और निर्णायक नेतृत्व ये शब्द अब कांग्रेस के भीतर खोखले लगने लगे हैं, जबकि भाजपा के पक्ष में जाते हुए इन्हीं शब्दों में भरोसा दिख रहा है। यह फर्क किसी प्रचार से नहीं, बल्कि ज़मीनी अनुभव से पैदा हुआ है। कांग्रेस की रणनीति आज भी “सरकार गिराओ” के शोर में अटकी है, जबकि भाजपा “सरकार चलाओ” के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड में कांग्रेस आज बैकफुट पर नहीं, बल्कि आत्ममंथन से भागती हुई नज़र आती है। गणेश गोदियाल का नेतृत्व अब पार्टी को जोड़ने का केंद्र नहीं रहा, बल्कि असंतोष का प्रतीक बनता जा रहा है। जब नेता की भाषा में कड़वाहट और संगठन में खामोशी हो, तो परिणाम वही होता है जो आज दिख रहा है कांग्रेस का दामन लगातार छूट रहा है और राजनीति की धुरी बिना शोर किए भाजपा की ओर खिसकती जा रही है।








