
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विजन के अनुरूप उत्तराखण्ड में शहरी परिवहन को लेकर जिस तरह की सक्रियता दिखाई जा रही है, वह केवल परियोजनाओं की समीक्षा भर नहीं बल्कि एक संरचनात्मक बदलाव की शुरुआत मानी जानी चाहिए। देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे तेजी से फैलते शहरों में यातायात दबाव, अनियोजित शहरी विस्तार और तीर्थ-पर्यटन आधारित मौसमी भीड़ लंबे समय से बड़ी चुनौती रहे हैं। ऐसे में ई-बीआरटीएस, पीआरटी और रोपवे जैसी बहुस्तरीय परिवहन प्रणालियों को एकीकृत दृष्टिकोण से आगे बढ़ाना रणनीतिक कदम है।
आवास सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार द्वारा की गई मैराथन समीक्षा इस बात का संकेत है कि सरकार अब केवल डीपीआर और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि जमीनी प्रगति पर फोकस कर रही है। 31.52 किमी लंबे देहरादून ई-बीआरटीएस कॉरिडोर का प्रस्ताव राजधानी के मुख्य आवागमन मार्गों को कवर करेगा। यदि इसे समयबद्ध और तकनीकी रूप से सशक्त तरीके से लागू किया गया तो निजी वाहनों पर निर्भरता घटेगी, ट्रैफिक जाम में कमी आएगी और प्रदूषण नियंत्रण में मदद मिलेगी।
हरिद्वार में प्रस्तावित इंटीग्रेटेड रोपवे और 20.73 किमी लंबी पीआरटी प्रणाली तीर्थ सीजन के दौरान यातायात प्रबंधन में गेम चेंजर साबित हो सकती है। विशेष रूप से त्रिवेणी घाट से नीलकंठ तक रोपवे को मिली स्वीकृति धार्मिक पर्यटन को नई दिशा दे सकती है। इससे सड़क यातायात का दबाव कम होगा और यात्रा समय घटेगा, जो सीधे तौर पर श्रद्धालुओं के अनुभव और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।
महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन परियोजनाओं को ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट मॉडल से जोड़ने पर जोर दिया गया है। इसका अर्थ है कि परिवहन तंत्र केवल आवागमन का साधन नहीं रहेगा, बल्कि उसके आसपास नियोजित शहरी विकास, व्यावसायिक गतिविधियां और आवासीय विस्तार को भी दिशा मिलेगी। यह दृष्टिकोण उत्तराखण्ड को अव्यवस्थित विस्तार से बचा सकता है।
पार्किंग पॉलिसी-2022 के समन्वय की बात इस योजना की गंभीरता को दर्शाती है। अक्सर बड़े ट्रांजिट प्रोजेक्ट इसलिए अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते क्योंकि पार्किंग और लास्ट माइल कनेक्टिविटी की योजना स्पष्ट नहीं होती। यदि सरकार इस पहलू को समानांतर रूप से लागू करती है तो सार्वजनिक परिवहन की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं—भूमि हस्तांतरण, वन स्वीकृति, वित्तीय व्यवहार्यता, पीपीपी मॉडल की पारदर्शिता और समयबद्ध क्रियान्वयन सबसे बड़ी कसौटी होंगे। 30 वर्ष के कंसेशन पीरियड को बढ़ाने पर विचार निजी निवेश आकर्षित करने की दिशा में व्यावहारिक कदम हो सकता है, लेकिन इसके साथ जनहित संतुलन भी सुनिश्चित करना होगा।
साफ है कि यह केवल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के शहरी भविष्य का ब्लूप्रिंट है। यदि योजनाएं निर्धारित समयसीमा में धरातल पर उतरती हैं तो देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश क्षेत्र आधुनिक, पर्यावरण-अनुकूल और सुव्यवस्थित परिवहन नेटवर्क से जुड़ सकते हैं। यह पहल प्रदेश को पर्वतीय राज्य की पारंपरिक छवि से आगे बढ़ाकर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के मानचित्र पर मजबूत स्थिति दिला सकती है।








