“कर्म ही पूजा है” – अगर इस कथन की आज की तारीख में कोई जीवंत मिसाल चाहिए तो ज़िला देहरादून के डीएम सविन बंसल की हालिया कार्यशैली को देख लीजिए। साहब ने कुर्सी को कभी अधिकार का सिंहासन नहीं, बल्कि सेवा की चौकी माना। और यही वजह है कि उनके फेसबुक पोस्ट अब महज़ प्रशासनिक घोषणाएं नहीं, बल्कि संवेदनाओं से लबरेज़ उम्मीद की किरणें बन चुके हैं।

अब देखिए ना – एक ओर गुरिंदर, जिसकी शारीरिक अक्षमता ने आठ संस्थानों के दरवाज़े तो बंद कर दिए, लेकिन डीएम बंसल की संवेदनशील दृष्टि ने उसके लिए कंप्यूटर प्रोग्रामर की नौकरी का दरवाज़ा खोल दिया। बात तो सीधी सी है – जहां दुनिया योग्यता में शरीर ढूंढती है, वहीं सविन बंसल हुनर में इंसान देखते हैं। शायद इसी को नज़र का फर्क कहते हैं!
और वो अदिति और आदित्य – अनाथ भाई-बहन, जिनका 50 हजार का बंधक ऋण रायफल फंड से जमा कराया गया। कहने को ये प्रशासनिक कार्य है, पर असल में ये वो अदृश्य करुणा है जो शायद फाइलों में दर्ज नहीं होती, लेकिन ज़िंदगियों में अमिट छाप छोड़ जाती है।
शमीमा की कहानी तो जैसे प्रशासन की मानवीयता की सबसे मार्मिक तस्वीर है – एक विधवा, एकल महिला, जिसे कोई देखता भी नहीं, वहां आर्थिक सहायता का चैक खुद डीएम साहब के हाथों पहुँचना, ये दर्शाता है कि कुछ अफसर आज भी अपने दिल से काम करते हैं, न कि महज़ कलम से।
और हाँ, बालवाड़ी के बच्चों की तरफ जो अतिरिक्त 30 हज़ार की सहायता दी गई है, वो शिक्षा के प्रति उस लगन की मिसाल है, जो शायद कहीं किताबों में तो पढ़ाई जाती है, पर अमल करते बहुत कम दिखते हैं।
सविन बंसल का काम करना जैसे नाटक नहीं, बल्कि एक ऐसा मंचन है जहाँ हर पात्र को उसका हक़ मिलता है – चाहे वो दिव्यांग हो, अनाथ हो, विधवा हो या निर्धन। उनके पोस्ट में प्रशासनिक आदेश कम, मानवीय संवेदना ज़्यादा झलकती है।
तंज ये नहीं कि साहब फेसबुक पर एक्टिव हैं, असली व्यंग तो उन अफसरों पर बनता है जो फील्ड में इनएक्टिव होते हुए भी अपनी कुर्सी को ही पोस्ट समझ लेते हैं।
डीएम सविन बंसल जैसे अफसरों से प्रेरणा लेकर अगर सिस्टम के बाकी पुर्जे भी हरकत में आ जाएँ, तो वो दिन दूर नहीं जब प्रशासन शब्द सिर्फ डर का पर्याय नहीं, बल्कि आश्वासन का प्रतीक बन जाएगा।








