
देहरादून के समाज कल्याण विभाग में हाल ही में जो प्रकरण सामने आया है, उसने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है। दिव्यांग असहाय बालिकाओं को दाखिला देने से इनकार करने वाली पंजीकृत नामी संस्थाओं ने उस सामाजिक विश्वास को गहरी चोट पहुंचाई है, जो वर्षों से इन पर जनता और प्रशासन दोनों ने रखा था।
इन संस्थाओं की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि ये अपने कागज़ों में आदर्श हैं, लेकिन जमीन पर बेरुखी और संवेदनहीनता की मिसाल बन चुकी हैं। यह तब उजागर हुआ जब जिला प्रशासन को कुछ मानसिक रूप से दिव्यांग बालिकाओं के दाखिले को लेकर संस्थाओं की तरफ से स्पष्ट इनकार मिला – वह भी तब, जब ये संस्थाएं सरकार से भारी भरकम फंडिंग, विदेशी अनुदान और सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करती रही हैं।
इस पूरे मामले में जिलाधिकारी सविन बंसल की सक्रियता ने प्रशासन को कठघरे में नहीं, नेतृत्व के मंच पर खड़ा किया है। उन्होंने जिस संवेदनशीलता और दृढ़ता से 10 बिंदुओं पर जांच समिति गठित की है, वह प्रशासनिक इच्छाशक्ति का प्रमाण है। डीएम का यह स्पष्ट संदेश कि “अगर एक दस्तखत संस्थाओं को खड़ा कर सकता है, तो वही दस्तखत उन्हें बंद भी कर सकता है”, न सिर्फ सटीक तंज है बल्कि उन लोगों के लिए चेतावनी भी है जो सेवा के नाम पर लाभ का धंधा चला रहे हैं।
जांच के घेरे में आई संस्थाएं समाज में ‘सेवाभाव’ के प्रतिनिधि मानी जाती रही हैं, लेकिन अगर यही संस्थाएं ज़रूरतमंद बच्चों के लिए अपने दरवाज़े बंद कर लें, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है – क्या ये संस्थाएं बच्चों की सेवा कर रही हैं या अपनी छवि की?
डीएम ने यह भी स्पष्ट किया कि समाज कल्याण अधिकारी और जिला प्रोबेशन अधिकारी केवल फाइलों पर दस्तखत करने वाले बाबू न बनें, बल्कि उन्हें समझना होगा कि उनकी सिफारिशों पर सैकड़ों ज़िंदगियां निर्भर हैं। यह टिप्पणी केवल एक विभागीय चेतावनी नहीं है, यह पूरे तंत्र के लिए आईना है।
जिन संस्थाओं का नाम सेवा और सहारा देने के लिए लिया जाना चाहिए था, आज वे जांच और जवाबदेही की सूची में हैं। अब यह समय है जब शासन को यह तय करना होगा कि सेवाभाव की आड़ में चल रहे पेशेवर ढांचे को रोका जाए, और जिनका उद्देश्य वास्तव में दिव्यांग कल्याण है, उन्हें प्रोत्साहन मिले।
इस प्रकरण ने जनपद देहरादून में एक गंभीर सामाजिक प्रश्न खड़ा कर दिया है – सेवा के नाम पर बनी संस्थाएं क्या वास्तव में समाज की उम्मीदों पर खरी उतर रही हैं? और अगर नहीं, तो उन्हें समाज से मिले सम्मान और संसाधनों पर एक ईमानदार पुनर्विचार जरूरी है।
डीएम सविन बंसल के इस साहसिक कदम ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि अब प्रशासन सोता नहीं देखता है – और जब प्रशासन जागता है, तो दिखावे की चादरें उतरती देर नहीं लगती।








