
हर वर्दी न्याय की नहीं होती – कुछ जेब की भी होती है। और अब तो ये फर्क भी मिटता जा रहा है कि वर्दी में अफसर है या दलाल। जिस दिन एक चौकी प्रभारी एक लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा गया, उस दिन हड़कंप तो मचा, मगर कोई चौंका नहीं — क्योंकि अब ये खबर नहीं, आदत बन चुकी है।
ये महज एक चौकी की कहानी नहीं है, ये उस पूरे तंत्र का आइना है, जो अब सेवा नहीं, सुविधा शुल्क से चलता है। थाने-चौकियों की दीवारों पर अब गांधी जी के फोटो नहीं, ‘रेट लिस्ट’ टंगी होती है — एफआईआर करवानी है, रेट है। न करवानी हो, उसका अलग रेट। समझौता चाहिए, तो थाने में ही फैसला — बस मुंहदेखी फीस एडवांस में।
अब थाने इंसाफ का मंदिर नहीं, टेंडर एजेंसी हो गए हैं। कोई गुनहगार हो या पीड़ित — न्याय अब जेब देखकर मिलता है। जो जेब से दमदार है, उसके लिए कानून झुकता है, और जो कमजोर है, उसकी आवाज़ थाने के गेट तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है।
सच्चाई ये है कि अब वर्दी पहनने से पहले टारगेट तय हो जाता है — किससे कितना वसूलना है, कैसे करना है, और ऊपर कितनी कमाई पहुंचानी है। ये वो सिस्टम है, जहां ट्रांसफर-पोस्टिंग के फैसले मेरिट पर नहीं, ‘कमाकर देने’ की क्षमता पर होते हैं।
जो “कमा कर देगा” उसे शहर की कमाऊ चौकी का चार्ज मिलेगा, जो नहीं देगा — वो फाइलें झाड़ता रहेगा किसी कमरे के कोने में।
थाने अब सुरक्षा के नहीं, संग्रहालय के प्रतीक बन गए हैं — जहां पुराना कानून किताबों में सड़ रहा है और नया ‘व्यवसाय मॉडल’ फाइलों के नीचे पनप रहा है। सबसे बड़ी ट्रैजेडी ये है कि इस गंदगी के बीच कुछ ईमानदार अफसर भी हैं, जो सचमुच जनता की सेवा करना चाहते हैं — लेकिन उन्हें या तो सिस्टम चुप करा देता है या सजा के तौर पर कहीं ऐसा भेज दिया जाता है जहां ‘कमाई की कोई गुंजाइश’ न हो।
कभी-कभी लगता है कि पुलिस विभाग अब कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, ‘कलेक्शन एजेंसी’ बन चुका है — ऊपर से लेकर नीचे तक सबकी नजर वसूली पर है। और ये वसूली सिर्फ बाहर से नहीं, अंदर से भी होती है — कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर तक, सब अपनी जेब से पोस्टिंग की कीमत चुकाते हैं और फिर जनता से ब्याज समेत वसूलते हैं।
जब कोई रिश्वत लेते पकड़ा जाता है, तो उसे बड़ी उपलब्धि की तरह पेश किया जाता है — मगर असल में ये गिरफ्तारी कोई सफलता नहीं, सिस्टम की विफलता का दस्तावेज़ है। ये सिर्फ एक बदनुमा धब्बा नहीं, पूरी व्यवस्था के चेहरे पर कालिख है।
दरअसल असली जांच तो इस मानसिकता की होनी चाहिए — जिसमें वर्दी को ताकत नहीं, व्यापार समझा जाता है। जिसमें कानून की किताब से ज़्यादा ताकत उस फोन कॉल में होती है जो ‘ऊपर से आया है’। जिसमें ‘नजराना’ तय करता है कि कौन आरोपी है और कौन पीड़ित।
ये पोस्ट किसी एक जिले, एक अफसर या एक घटना की आलोचना नहीं है — ये उस सोच पर प्रहार है, जो पुलिस को ‘सेवक’ नहीं, ‘सौदागर’ बना चुकी है।
जब तक व्यवस्था नहीं बदलेगी, जब तक वर्दी की गरिमा को कमाई का जरिया समझा जाएगा — तब तक हर अगली गिरफ्तारी के साथ सिर्फ वर्दी नहीं, पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा होगा। और उस दिन शायद कोई ईमानदार अफसर भी यह सोचने पर मजबूर होगा — कि इस वर्दी की कीमत अब सेवा से नहीं, सामर्थ्य से आंकी जाती है।








