
मुख्यमंत्री के “सुखदजन” संकल्प से प्रेरित जिलाधिकारी सविन बंसल ने जनता दर्शन को केवल औपचारिकता की खानापूर्ति नहीं, बल्कि जनसंवाद और जवाबदेही का सशक्त माध्यम बना दिया है। ऋषिपर्णा सभागार में आज आयोजित जनसुनवाई में 85 शिकायतें आईं, जिनमें ज़्यादातर भूमि विवाद, सरकारी उदासीनता और विभागीय सुस्ती को उजागर करती हैं। यह एक तरफ जनता की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक मशीनरी की असलियत भी।
सबसे चर्चित मामला पुलमा देवी का रहा, जिन्होंने 2007 में जिस ज़मीन की रजिस्ट्री कराई थी, वो 2020 में किसी और को दोबारा बेच दी गई। ये सिर्फ ज़मीन नहीं, भरोसे का दोबारा बिकना है। डीएम ने इस प्रकरण पर न केवल एसडीएम के नेतृत्व में जांच समिति बनाई, बल्कि सीधे-सीधे इसे एसआईटी को सौंपने का निर्देश भी दे दिया। यह साहसिक निर्णय बताता है कि सविन बंसल “सुनते ही नहीं, दिखते भी हैं।”
लेकिन सवाल ये है कि क्या डीएम की सक्रियता विभागों की निष्क्रियता को ढकने के लिए काफी है? जब डीएम को एमडीडीए अधिकारियों के सामने फरियादी की शिकायत पर मौके पर ही प्रवर्तन की तारीख तय करवानी पड़ी, तो साफ हो गया कि “फाइलों की सरसराहट, समाधान की गारंटी नहीं है।”
शिक्षा विभाग की पोल भी खुली जब जर्जर स्कूल भवनों की शिकायतों पर डीएम ने तीखा सवाल दागा – “इतना बजट देने के बाद भी भवन जर्जर क्यों हैं? बीईओ कर क्या रहे हैं?”। यह सवाल जितना सीधा था, जवाब उतना ही घबराया हुआ होगा। शिक्षा, जो नींव है, अगर उसी की दीवारें दरक रही हैं, तो विकास की इमारत कितनी मजबूत होगी?
वन विभाग की लापरवाही तो एक अलग ही अध्याय है। हुकम सिंह जैसे फरियादी वर्षों से सीमांकन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। सर्वेक्षण न होने पर जब डीएम ने 3 दिन का अंतिम समय दिया, तब जाकर विभाग हरकत में आया। सोचिए, यदि जनता दर्शन न होता, तो क्या ये अधिकारी कभी कुर्सी से उठते?
इसी तरह दिव्यांग महिला बबीता को मौके पर ही रोजगारपरक प्रशिक्षण और स्वरोजगार के लिए स्वीकृति दिलाई गई, जबकि एक 70 वर्षीय वृद्धा अन्नपूर्णा गुंसाई की निजी प्लॉट में सीवर बहाव की शिकायत पर उसी शाम निगम को भेज सफाई करवाई गई। ये उदाहरण बताते हैं कि “जहां इच्छा है, वहां कार्यवाही भी है।”
जनता दर्शन में एक और अहम बात यह रही कि डीएम ने सिर्फ सुनवाई नहीं की, बल्कि कार्यवाही की ‘तिथि’ भी निर्धारित करवाई। यह प्रशासनिक अनुशासन का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां अधिकारी केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन नोटिसों पर अमल का समय भी तय हुआ।
लेकिन फिर सवाल वहीं आता है — क्या हर शिकायत को जिलाधिकारी की मेज तक पहुंचाना जरूरी है? क्या हर समाधान डीएम के हस्तक्षेप पर ही संभव है? अगर हाँ, तो फिर बाकी विभाग किसलिए हैं? डीएम की सक्रियता के समानांतर, विभागों की निष्क्रियता ही जनता दर्शन की बढ़ती भीड़ का कारण है।
जनता दर्शन एक आईना बन चुका है — जिसमें आम आदमी उम्मीद लेकर आता है और सिस्टम की हकीकत भी झलकती है। यदि सभी विभाग डीएम जैसी तत्परता दिखाएं, तो जनता को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। वरना यही कहा जाएगा:
“जनता दर्शन में मिल रहा है समाधान,
बाकी विभागों में सिर्फ दिल का घाव।”
इसलिए जरूरत है कि जिलाधिकारी की पहल को हर विभाग अपना उदाहरण माने, न कि अपवाद। तभी ‘सुखदजन’ का संकल्प सिर्फ पोस्टर पर नहीं, ज़मीन पर भी नजर आएगा।








