

भू-संवेदनशील उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री को खुद यह बताना पड़े कि भूस्खलन की स्थिति में 15 मिनट में जेसीबी पहुँचे—यह दृश्य जितना सक्रिय नेतृत्व का प्रतीक लगता है, उतना ही ये इस बात का सबूत भी है कि प्रशासनिक तंत्र किस हद तक कुंद और सुस्त हो चला है। मुख्य सचिव से लेकर जिलाधिकारी तक जो बातें सालों से ‘रूटीन’ बन जानी चाहिए थीं, उन्हें अब मुख्यमंत्री को ‘सख्त निर्देश’ के रूप में दोहराना पड़ रहा है।
बरसात आने से पहले पुलों का सुरक्षा ऑडिट कराना, एम्बुलेंस बदलवाना, संवेदनशील स्कूलों में पढ़ाई बंद कराना, आश्रमों और अस्पतालों में खुले बिजली तारों को ढकवाना—सभी बातें इतनी बुनियादी हैं कि इन्हें कहने से ज़्यादा शर्म इस बात की होनी चाहिए कि ये आज तक खुद-ब-खुद नहीं हो रही थीं। यह हालत है उस प्रदेश की, जिसने 2013 की त्रासदी के बाद आपदा प्रबंधन के नाम पर तमाम योजनाएं और घोषणाएं झेली हैं।
मुख्यमंत्री ने जब कहा कि एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ स्थानीय लोगों को भी प्रशिक्षित कर राहत-बचाव कार्यों में लगाया जाए, तो वह शासन व्यवस्था के उस खालीपन की ओर इशारा कर रहे थे, जिसे कभी नौकरशाही की जिम्मेदारी माना जाता था। पर आज स्थिति ये है कि हर ज़िम्मेदारी का रोडमैप मुख्यमंत्री खुद बना रहे हैं—जैसे वो सचिवालय नहीं, चौकी चला रहे हों।
गर्भवती महिलाओं का डेटाबेस बनवाना हो या जलाशयों की सिल्ट सफाई—हर पहलू में मुख्यमंत्री को खुद मैदान में उतरना पड़ रहा है। आखिर यह कौन सी व्यवस्था है जहां मुख्य सचिव से लेकर सचिव, अधिकारी और तकनीकी टीम तक केवल आदेश की प्रतीक्षा में हैं? क्या उन्हें स्वयं तय नहीं करना चाहिए था कि मानसून सीजन से पहले क्या-क्या ज़रूरी है?
चारधाम यात्रा जैसी अंतरराष्ट्रीय निगाहों में रहने वाली यात्रा को लेकर भी निर्देश मुख्यमंत्री को देने पड़ रहे हैं—अधिक बारिश में यात्रियों को सुरक्षित जगह रोको, फिर आगे भेजो—जैसे शासन में काम करने वाले अफसर इन बातों से अनजान हों।
दरअसल यह पूरा घटनाक्रम एक तरफ मुख्यमंत्री की तत्परता दिखाता है, तो दूसरी तरफ हमारी शासन व्यवस्था की जड़ता और निर्भरता की पोल खोलता है। जिन्हें योजना बनानी थी, वे आजकल योजनाओं पर भाषण सुनने में व्यस्त हैं। और जिन्हें भाषण देना था, वे आजकल खुद निर्देश लिखवा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने जो कहा, अच्छा कहा—पर ये कहने की नौबत ही क्यों आई? यही असली सवाल है।








