
वो दौर अब शायद बीत चुका है जब पत्रकारों को सिर्फ़ सरकारों की आलोचना करने वाला एक ठप्पा लगाकर देखा जाता था। अब वक्त ऐसा भी आया है जब पत्रकार को सिर्फ़ सवाल पूछने वाला नहीं, इंसान भी समझा जाने लगा है – वो भी ऐसा इंसान जिसे दवा, इलाज, और इज्जत – तीनों की ज़रूरत है।

पुष्कर सिंह धामी इस मामले में देश के उन विरले मुख्यमंत्रियों में से हैं, जिन्होंने पत्रकारों को न तो चाटुकार समझा, न ही विपक्ष का एजेंट। उन्होंने पत्रकार को वही माना, जो वो होता है – समाज का आईना। और फिर उस आईने को साफ़ रखने की जिम्मेदारी खुद उठा ली।
उत्तराखंड में 265 से ज्यादा मेडिकल जांचें फ्री करवा देना कोई ‘फाइलों में फंसा’ आदेश नहीं, बल्कि सीएम धामी की संवेदनशीलता का परिचय है। जहां बाकी प्रदेशों में पत्रकारों के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में घुसने के लिए भी परिचयपत्र झाड़ना पड़ता है, वहां उत्तराखंड में उन्हें डॉक्टर की पर्ची मिल रही है – वो भी बिना फीस के। यह कोई मामूली बात नहीं है।
जो जांचें अक्सर ‘पैकेज’ के नाम पर हज़ारों में बिकती हैं, वो आज बिना किसी VIP पहचान के, एक आम पत्रकार और उसके परिवार को मिल रही हैं। यह पत्रकारिता का वो दुर्लभ क्षण है, जब कैमरे के पीछे वाला शख़्स भी पहली बार खुद फ़ोकस में आया है – एक मरीज़ के रूप में, एक नागरिक के रूप में।
बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ये दृश्य शायद चुभे भी। उन्हें लग सकता है कि ये तो अतिरिक्त सुविधा है। मगर असल में ये वो मूलभूत गरिमा है, जो पत्रकार को मिलनी ही चाहिए – और मिल रही है।
धामी जी ने हेल्थ कैंप नहीं लगवाया, उन्होंने भरोसे का एक टॉनिक दिया है – ये दिखाकर कि सरकारें अगर चाहें तो पत्रकारों से डरने की बजाय उनके साथ खड़ी हो सकती हैं। ये कोई ‘डैमेज कंट्रोल’ नहीं है, ये एक सोच है, जो बाकियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है – बशर्ते वो ईमानदारी से चाहें।
वरना बाकी जगहों पर तो पत्रकारों के हिस्से सिर्फ़ “सूचना भेजी गई है”, “देख रहे हैं”, “मुख्यमंत्री व्यस्त हैं” जैसे वाक्य आते हैं। और यहां? यहां खुद सरकार पत्रकार को स्वस्थ रखने के लिए स्टेथोस्कोप लेकर खड़ी है।
ये एक सधी हुई मुस्कान है, धामी जी की ओर से – वो मुस्कान जो कहती है, “आप लिखते रहिए, मैं आपकी चिंता करता हूं।”








