
पत्रकारिता, एक ऐसा पेशा जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, पर दुर्भाग्य से, इस स्तंभ को मज़बूती देने वाले पत्रकार स्वयं कब बीमार हो जाते हैं, उन्हें ही पता नहीं चलता। दिन-रात लोगों की समस्याओं को उजागर करने वाले पत्रकार जब खुद बीमार पड़ते हैं, तो उनका हाल पूछने वाला कोई नहीं होता—लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहल और संवेदनशील नेतृत्व में देहरादून में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक स्वास्थ्य शिविर नहीं था, बल्कि पत्रकारों के प्रति एक सोच, एक प्रतिबद्धता और एक संदेश था—कि जो लोग दूसरों की लड़ाई लड़ते हैं, उनकी सेहत की भी चिंता की जाएगी।
रिंग रोड स्थित सूचना निदेशालय में जब 350 से अधिक पत्रकार और उनके परिजन जांच के लिए पहुंचे, तो यह नज़ारा सिर्फ ‘एक आयोजन’ नहीं था, यह विश्वास का एक मंच था। वरिष्ठ चिकित्सकों की टीम, पैथोलॉजी, परामर्श, आभा आईडी, ‘वय वंदन’ कार्ड—सब कुछ एक ही छत के नीचे। यह उस सिस्टम की झलक थी, जो अगर चाहे तो संवेदनशीलता और कार्यकुशलता दोनों साथ लेकर चल सकता है।
स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार इस पूरे अभियान के आर्किटेक्ट के रूप में सामने आए। आमतौर पर सचिव पद पर बैठे लोग ‘फाइलों’ से संवाद करते हैं, लेकिन डॉ. कुमार ने सीधे ज़मीन पर संवाद किया। पत्रकारों की व्यस्तता, उनकी चुनौतियों और उनकी उपेक्षित सेहत को समझते हुए, उन्होंने इस शिविर को ऐसा स्वरूप दिया जिसमें तकनीक, सहानुभूति और स्वास्थ्य—तीनों का सुंदर समन्वय दिखा। आभा आईडी से लेकर ‘वय वंदन’ कार्ड तक—हर पहलू में भविष्य की योजना झलकती है, सिर्फ खानापूर्ति नहीं।
और जहां बात हो स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की, वहां डॉ. आशुतोष सयाना का नाम छूट जाए, यह संभव नहीं। चिकित्सा शिक्षा निदेशक डॉ. सयाना ने न सिर्फ व्यवस्थाएं सुनिश्चित कीं, बल्कि शिविर की बारीकियों में खुद शामिल रहे। वे किसी प्रिंसिपल की तरह नहीं, एक सजग चिकित्सक और व्यवस्थापक की तरह मैदान में थे। जब वे कहते हैं कि “कई पत्रकारों को पहली बार शुगर, बीपी और दृष्टि दोष की जानकारी मिली”, तो यह हमारे सिस्टम की विफलता नहीं, बल्कि इस कैंप की सफलता है। जो पहले कभी नहीं हुआ, वो अब हो रहा है। और हां, इस बात में भी एक व्यंग्य है—देश की सबसे तेज़ न्यूज़ देने वाले पत्रकार, अपने ब्लड प्रेशर की ख़बर से अब तक अनजान थे!
महानिदेशक सूचना बंशीधर तिवारी ने इसे ‘एक प्रयास’ कहा, लेकिन वास्तव में यह ‘एक शुरुआत’ है। जो बातें अब तक घोषणाओं और प्रेस नोट्स तक सीमित रहती थीं, वो अब धरातल पर दिखाई दीं।
यह शिविर सिर्फ डॉक्टरों और दवाओं का आयोजन नहीं था, यह राज्य सरकार के भीतर उस सोच का प्रतिबिंब था, जो अब पत्रकारों को सिर्फ खबर देने वाला नहीं, बल्कि समाज का एक ज़रूरी हिस्सा मान रही है।
अब सवाल ये है—क्या बाकी राज्य भी इस मिसाल से कुछ सीखेंगे? और क्या मंत्री जी लोग भी अब पत्रकारों को सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुर्सियां गिनने वाला नहीं, इंसान समझना शुरू करेंगे? क्योंकि अब पत्रकारों को भी समझ आ गया है कि हेल्थ रिपोर्ट भी उतनी ज़रूरी है, जितनी ब्रेकिंग न्यूज़।








