

दो घंटे… सिर्फ दो घंटे के औचक निरीक्षण ने सरकारी अस्पताल की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी। ऋषिकेश उप जिला चिकित्सालय में डीएम सविन बंसल की एंट्री हुई नहीं कि व्यवस्था की नब्ज पर उनकी उंगली रखी गई — और जहां भी धड़कन असामान्य मिली, वहां तत्काल इलाज शुरू हो गया।
कहने को निरीक्षण था, मगर असर किसी सर्जरी से कम नहीं था। एक-एक वार्ड, एक-एक लैब, टीकाकरण कक्ष से लेकर एक्सरे मशीन और आईसीयू तक — डीएम की नजरें सिर्फ देख नहीं रहीं थीं, सिस्टम को दुरुस्त भी कर रही थीं।
न सिर्फ फटकार, समाधान भी साथ
चन्दन लैब की अव्यवस्था पर डीएम ने तीखा रिएक्शन दिया — “15 दिन, और व्यवस्था सुधर जानी चाहिए!” आदेश सिर्फ बोले नहीं गए, लिखित हुए — और जो भुगतान होना है, वो अब बिना एसडीएम व एसीएमओ की जांच के नहीं होगा। स्पष्ट है, अब अस्पतालों में ‘पेपरवेट’ नहीं, ‘परफॉर्मेंस’ चलेगी।
टीकाकरण केन्द्र नहीं, अब मॉडल बनेगा
जिस कक्ष में बच्चों को सुई से डराया जाता था, अब वहां मनोरंजन के साधन, एसी और बेहतर सुविधा होगी। डीएम ने साफ कहा — “जिला अस्पताल जैसी सुविधा यहां भी चाहिए।” ये सिर्फ आदेश नहीं, एक विजन है — सरकारी अस्पताल को ‘सरकारी’ के टैग से आगे ले जाने का।
आईसीयू, एसएनसीयू और सबके लिए दवा काउंटर
डीएम की पहली विजिट का नतीजा था आईसीयू का संचालन। अब वहां हर माह 50 मरीज लाभ ले रहे हैं। इस बार एसएनसीयू (SNCU) को भी जीवनदायिनी नजर मिली। स्टाफ की स्वीकृति वहीं मौके पर दी गई। दवा वितरण काउंटर अब ‘एक सबके लिए’ नहीं, बल्कि महिला, पुरुष, बुजुर्ग और सामान्य वर्ग के लिए अलग-अलग होंगे — यानी अब लाइन में नहीं, सुविधा में फर्क दिखेगा।
लिफ्ट बंद? डीएम का पारा हाई
डीएम जब निरीक्षण पर थे, तब लिफ्ट बंद मिली, आरओ सिस्टम भी खराब मिला। बात आई तो सीएमएस को फटकार मिली और साथ में एक हफ्ते की डेडलाइन भी — “अब लापरवाही नहीं चलेगी।”
डायग्नोसिस नहीं, डायरेक्शन मिले
डीएम का निरीक्षण ‘शिकायतें सुनो’ वाला टूर नहीं था। यह एक एक्टिव विज़िट थी — जिसमें समस्याएं चिन्हित भी हुईं और उसी वक्त समाधान भी तय हुए। उपनल के माध्यम से लैब टेक्नीशियन रखने की स्वीकृति हो या बच्चों के टीकाकरण कक्ष का विस्तार, सब कुछ रियल टाइम में डिसाइड हुआ।
सरकारी अस्पतालों को मिला कमांडर
डीएम बंसल के निरीक्षण से यह साफ है कि वह सिर्फ कुर्सी पर बैठने वाले नहीं, ज़मीन पर उतरने वाले अधिकारी हैं। मा. मुख्यमंत्री के निर्देशों को केवल कागज़ों तक सीमित न रखकर, अस्पताल की दीवारों और मरीज़ों की सुविधा तक पहुंचाना उनका लक्ष्य है।
कभी जो सरकारी अस्पताल सिर्फ मजबूरी का ठिकाना थे, वो अब सुविधाओं के मॉडल बनते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ सिस्टम में नहीं, सोच में भी आ रहा है — और इसकी नब्ज़ थामे हुए हैं एक मजबूत डीएम, जो न टालते हैं, न थमते हैं।








