
जब बात साइबर अपराध की हो और उत्तराखंड की फाइलों में कोई पेचीदा मामला उलझा हो, तो एक नाम सबसे पहले याद आता है—अंकुश मिश्रा। देहरादून में तैनात साइबर क्राइम के डीएसपी, लेकिन काम ऐसा कि मानो पूरे उत्तराखंड की डिजिटल सुरक्षा इनके भरोसे हो।
इनके बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि ये वर्दी में एक चलता-फिरता फायरवॉल हैं। इंटरनेट की गहराइयों में छिपे साइबर अपराधियों को पकड़ने का हुनर जैसे इनके डीएनए में शामिल हो। बात हो फर्जी इन्वेस्टमेंट स्कैम की हो या फेसबुक फ्रॉड की, OTP ट्रैप हो या क्रिप्टो ठगी की कोई उलझी हुई गुत्थी—हर बार मिश्रा साहब की तेज़ निगाहें और तकनीकी समझ ऐसे केस की चीरफाड़ करती हैं जैसे कोई सर्जन ऑपरेशन टेबल पर कर रहा हो।
मामले चाहे देश के कोने-कोने से जुड़े हों, जाल चाहे कितने ही इनक्रिप्टेड क्यों न हों, अंकुश मिश्रा के सामने साइबर अपराधियों की सारी योजनाएं बेनकाब हो जाती हैं।
वो किसी फिल्मी पुलिस अफसर की तरह डायलॉग नहीं मारते, लेकिन जब कोई केस हल करते हैं तो पूरा सिस्टम ताली जरूर बजा देता है। फाइलें जब दूसरों के लिए सिरदर्द बन जाती हैं, तब मिश्रा साहब कहते हैं—”अब देखते हैं, ये जाल कितनी दूर तक फैला है।” और यकीन मानिए, कुछ ही दिनों में आरोपी सलाखों के पीछे और साइबर ग्रुप का नेटवर्क ध्वस्त।
पनचुअल इतने कि अगर आप उनसे 10:00 बजे मिलने जाएं और घड़ी में 10:02 हो जाएं तो शायद आपको खुद से माफ़ी मांगनी पड़े। और डेडिकेशन ऐसा कि कंप्यूटर स्क्रीन के आगे बैठकर घंटों डाटा एनालिसिस करते रहेंगे, लेकिन तब तक नहीं उठेंगे जब तक उस एक डिजिटल सुराग को पकड़ न लें जो पूरे केस को पलट देता है।
उत्तराखंड प्रशासन और शासन को ऐसे अफसरों पर फख्र है, जो सिर्फ काम नहीं करते, बल्कि सिस्टम में भरोसे की मिसाल बनते हैं। ये वो अफसर हैं जिनकी फाइलों में सस्पेंस नहीं होता—सिर्फ निष्कर्ष होते हैं।
साइबर अपराधियों के लिए मिश्रा साहब एक चलती-फिरती आफत हैं। जब वो टीम को ब्रीफ करते हैं तो अपराधी कहीं न कहीं बैठा मोबाइल की स्क्रीन घूर रहा होता है और शायद उसी वक्त आखिरी बार नेट ऑन करता है। क्योंकि उसके बाद नेटवर्क कटता नहीं—सीधा पुलिस स्टेशन जुड़ता है।
आज जब ऑनलाइन ठगी के नए-नए हथकंडे निकलते हैं, तब सिस्टम को ऐसे अफसरों की जरूरत और बढ़ जाती है, जो न केवल टेक्नोलॉजी को समझते हैं, बल्कि अपराध की साइकोलॉजी भी। अंकुश मिश्रा उसी दुर्लभ मिश्रण का नाम हैं—जहां वर्दी सिर्फ रौब नहीं, ज़िम्मेदारी का प्रतीक है।
और आखिर में तंज इतना कि…
साइबर अपराधी अब OTP से नहीं, DSP से डरने लगे हैं।








