
जब सरकारी योजनाएं प्रेस नोट से बाहर निकलकर ज़िंदगी में उतरती हैं, तब वे किसी फ़ाइल की औपचारिकता नहीं, बल्कि उम्मीद की रोशनी बन जाती हैं। देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल का ‘नंदा-सुनंदा’ प्रोजेक्ट कुछ ऐसा ही प्रयास है — एक ऐसा मानवीय हस्तक्षेप, जो सरकारी व्यवस्था को “संवेदनशील सिस्टम” की नई परिभाषा दे रहा है।
आज जहां देश के कई हिस्सों में योजनाओं की घोषणाएं केवल मंचों पर तालियों की गूंज तक सीमित रह जाती हैं, वहीं देहरादून में “नंदा-सुनंदा” जैसी पहल उन घोषणाओं को आईना दिखा रही है। यहां सिर्फ वादे नहीं किए जा रहे, काम हो रहा है, वो भी बिना हो-हल्ले के।
कलक्ट्रेट परिसर में जब पाँच बालिकाओं को 1.65 लाख रुपए के चेक मिले, तो वह केवल एक वितरक कार्यक्रम नहीं था — वह शिक्षा की डोर से छूटी हुई ज़िंदगियों को फिर से जोड़ने की कोशिश थी। बेटियों की आंखों में चमक, और जुबान पर सिर्फ एक ही बात — “थैंक्यू डीएम सर” — ये उस काम की कीमत थी, जिसे न कोई विज्ञापन चाहिए, न कोई प्रचार।
इस प्रोजेक्ट से अब तक 38 बेटियों को करीब 14 लाख रुपये की मदद मिल चुकी है। गौरांशी से लेकर शताक्षी तक, ये बेटियां अब अपने भविष्य के पन्ने खुद लिखने की कोशिश कर रही हैं। कोई ब्यूटी इंस्टीट्यूट में है, कोई यूनिवर्सिटी में — और वो भी तब जब ज़िंदगी उन्हें किनारे कर चुकी थी।
यह सोचने की बात है कि जब एक डीएम अपने “विभिन्न स्रोतों” से धन जुटाकर बेटियों की शिक्षा का भार उठाता है, तो वह केवल एक अफसर नहीं रहता — वह एक अभिभावक बन जाता है।
और यही तो प्रशासन का असली अर्थ है — ‘जन का मित्र’, न कि केवल ‘कानून का पालक।’
‘नंदा-सुनंदा’ न केवल शिक्षा को पुनर्जीवित कर रहा है, बल्कि उस सामाजिक सोच को भी पलट रहा है जो बेटियों को “बोझ” मानती है। डीएम सविन बंसल ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह प्रोजेक्ट उनके रहते-रहते नहीं रुकेगा — यह चलता रहेगा, चाहे वे रहें या न रहें। और यह बात उस जिम्मेदारी की गहराई को दर्शाती है, जो किसी ‘ट्रांसफर प्रूफ’ योजना का सपना दिखाती है।
यह सकारात्मक व्यंग्य भी है उस सिस्टम पर जो आज भी बेटियों की पढ़ाई को “लाभार्थी सूची” और “आधार लिंक” के बीच कहीं उलझा कर छोड़ देता है। “नंदा-सुनंदा” बताता है कि अगर इच्छा हो तो सिस्टम भी “सहारा” बन सकता है, सिर पर हाथ रख सकता है, और ये कह सकता है — “पढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।”
तो सवाल अब यह नहीं है कि “क्या सरकार बेटियों के लिए कुछ कर रही है?”
सवाल यह है — “क्या हर जिले में एक सविन बंसल हैं?”
क्योंकि जब बेटियों के हाथ में किताब होती है, तो समाज के हाथ में भविष्य की चाबी होती है।
और जब सरकार बेटी की चोटी में कलम का फिता बांध देती है, तब समाज बदलने लगता है।
बाकी योजनाएं कागजों में सो रही हैं, लेकिन ‘नंदा-सुनंदा’ की बेटियां अपने सपनों को जगा रही हैं।








