


देहरादून में एसटीएफ ने दिल्ली से नाइजीरिया मूल के एक साइबर ठग को दबोचकर करोड़ों के अंतरराष्ट्रीय पार्सल फ्रॉड के जाल का भंडाफोड़ किया है। आरोपी ने फेसबुक पर एक महिला की फर्जी पहचान बनाकर देहरादून के एक युवक को भरोसे में लिया, एम्स्टर्डम से गिफ्ट भेजने का झांसा दिया और कस्टम स्कैनिंग, गोल्ड लाइसेंस, करेंसी कन्वर्ज़न, बीमा, जीएसटी व क्लीयरेंस के नाम पर ₹28,98,650 की ठगी कर ली। एसटीएफ ने तकनीकी ट्रैकिंग, बैंक खातों और डिजिटल डोमेन की जांच कर आरोपी को पकड़ा। पूछताछ में सामने आया कि आरोपी के खातों में कुछ ही महीनों में करोड़ों का लेन-देन हुआ और देश के कई राज्यों में उसके खिलाफ केस दर्ज हैं। पुलिस ने उसके पास से 15 मोबाइल फोन, 10 सिम कार्ड, 5 एटीएम कार्ड, पासपोर्ट, लैपटॉप और अन्य उपकरण बरामद किए हैं।
विदेश से आने वाले ऐसे साइबर कलाकारों की कहानी भी गजब होती है। वीजा के नाम पर पढ़ाई, बिजनेस या टूरिज़्म का पासपोर्ट दिखाकर भारत की धरती पर कदम रखते हैं और यहां डिजिटल “कृषि” शुरू कर देते हैं — फसल होती है भोले-भाले लोगों की मेहनत की कमाई। इनका आईटी स्किल किसी मल्टीनेशनल के सीटीओ को मात दे सकता है, बस फर्क इतना है कि ये स्किल समाज की सेवा में नहीं, समाज की जेब साफ करने में लगता है।
वीजा प्रक्रिया की ढिलाई और स्थानीय एजेंटों के मोटे कमीशन का मेल इन्हें यहां बसने का मौका देता है। फिर एक टीम वर्क बनता है — कोई बैंक अकाउंट खोलने वाला, कोई सिम कार्ड दिलाने वाला, कोई फर्जी सरकारी अधिकारी बनकर कॉल करने वाला। सभी का काम तय, हिस्सा पक्का। यहां तक कि इनका “कस्टमर सपोर्ट” भी 24×7 एक्टिव रहता है, फर्क इतना कि कॉल सेंटर में आपकी समस्या सुलझती है, यहां आपकी जेब हल्की होती है।
समाधान सीधा है — वीजा के बाद ठिकानों का सख्त वेरिफिकेशन, मकान मालिकों को पुलिस इंटिमेशन अनिवार्य, संदिग्ध बैंक लेन-देन पर तत्काल जांच, और पकड़े जाने पर बिना कोर्ट-कचहरी की लंबी प्रक्रिया के सीधा डिपोर्ट। लेकिन असली ढाल तो जागरूकता है, क्योंकि तकनीक से तेज ठगी का सिर्फ एक ही इलाज है — जनता का “नो” कहना।
और हां, फेसबुक पर अचानक किसी “विदेशी सीनियर मैनेजर” की फ्रेंड रिक्वेस्ट आए, वो आपको महंगा गिफ्ट भेजने का वादा करे, फिर कहे कि कस्टम में फंस गया, थोड़ा पैसा भेज दो — समझ जाइए, ये लव स्टोरी नहीं, आपकी बैंक स्टोरी का “द एंड” है।








