
उत्तराखंड की राजनीति में इस वक्त एक ही चेहरा है जो विरोधियों की नींद और सपने दोनों उड़ा चुका है—पुष्कर सिंह धामी। चार साल में उन्होंने चुनावी मैदान को अपना निजी खेल का मैदान बना लिया है। उपचुनाव से लेकर लोकसभा, निकाय से लेकर पंचायत तक, हर बार धामी ने ऐसी ताबड़तोड़ पारी खेली कि विपक्ष का स्कोरकार्ड धूल फांकता रह गया। इस बार सत्ता के सेमीफाइनल में तो मामला और भी रोचक हो गया—जिला पंचायत की 12 में से 10 सीटों पर भाजपा का झंडा गाड़कर उन्होंने विपक्ष को बता दिया कि अब ‘खेल’ सिर्फ उनके रूलबुक से चलेगा।
आधी सीटों पर तो विरोधी मैदान में उतरे ही नहीं—निर्विरोध जीत ने भाजपा का हौसला और विपक्ष का मनोबल, दोनों का अंतर साफ कर दिया। बाकी बची सीटों पर मुकाबला ऐसा था जैसे अनुभवी बल्लेबाज के सामने अंडर-14 का गेंदबाज—नतीजा पहले से तय। नैनीताल का रिजल्ट होल्ड पर है, लेकिन जिस अंदाज में हवा चल रही है, वहां भी भगवा की आंधी का ही असर दिखने वाला है।
ब्लॉक प्रमुख के मोर्चे पर तो हालात और दिलचस्प रहे—75% से ज्यादा सीटें भाजपा के पाले में चली गईं। कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवार ऐसे दिखे जैसे बिना बैट के बल्लेबाज—न नतीजा निकला, न रन बने। ग्राम प्रधान चुनाव में 85% सीटों पर कब्जा जमाकर भाजपा ने विपक्ष को सीधा संदेश दे दिया है—”गांव-गांव में अब तुम्हारा कोई ग्राहक नहीं बचा।”
पहाड़ी अंचलों में भाजपा का जलवा इतना बढ़ चुका है कि अब वहां विपक्षी प्रचार वाहनों से ज्यादा उनके लापता होने की खबरें चल सकती हैं। धामी सरकार की सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और रोजगार वाली डिलीवरी ने जनता को इतना भरोसा दिया है कि खोखले भाषण अब लोकल चाय की दुकान पर भी खपने मुश्किल हो गए हैं।
राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि यह नतीजा 2027 के असली महासंग्राम का ट्रेलर है—और ट्रेलर देखकर ही विपक्ष के हाथ-पांव फूल गए हैं। अब वे चाहे सरकारी मशीनरी का रोना रोएं या मौसम का बहाना बनाएं, हकीकत यह है कि जनता ने साफ लिख दिया है—”धामी के खिलाफ खड़े होने से पहले अपना टिकट कैंसलेशन पॉलिसी पढ़ लो।”
धामी ने एक बार फिर दिखा दिया है कि उत्तराखंड में जीत अब न नारों से मिलती है, न भीड़ की गिनती से—यह काम से मिलती है। और जब काम का माइक्रोफोन जनता के कान में बजता है, तो विपक्ष की सियासी बैंड सिर्फ बैकग्राउंड म्यूज़िक बनकर रह जाती है।








