गांव से शहर तक भरोसे का नेटवर्क: टिहरी डोब नगर में एसबीआई का वित्तीय समावेशन शिविर, 59 गांव जुड़े अभियान से

SHARE:

जब किसी गांव के सामुदायिक हॉल में बैंकिंग की बातें गूंजती हैं, तो यह सिर्फ एक कैंप नहीं होता—यह उस दूरी को पाटने की कोशिश होती है, जो शहर की एसी ब्रांच और गांव के कच्चे रास्तों के बीच है। टिहरी डोब नगर, पथरी में एसबीआई का संतृप्ति शिविर ठीक वैसा ही रहा—जहां प्रधानमंत्री जनधन योजना (PMJDY), जीवन ज्योति बीमा (PMJJBY), सुरक्षा बीमा (PMSBY), अटल पेंशन योजना (APY) जैसी योजनाएं कागज़ से निकलकर लोगों के खातों में उतर आईं।

एलडीएम दिनेश कुमार गुप्ता का “री-केवाईसी ज़रूरी है” वाला संदेश सुनने में शायद बैंक का रूटीन नियम लगे, लेकिन असल में यह उसी ताले की चाबी है, जो कई बार फंड रिलीज़ न होने की वजह बन जाता है। 100 से ज्यादा ग्रामीणों की मौजूदगी बताती है कि लोग अब बैंक को सिर्फ पैसे रखने की जगह नहीं, बल्कि जीवन के सुरक्षा कवच की तरह देख रहे हैं। खास बात यह कि मौके पर ही वंचित वयस्कों का नामांकन हुआ—यह वही पल है जब ‘वित्तीय समावेशन’ का मतलब स्लाइड शो या प्रेस रिलीज़ नहीं, बल्कि आंखों के सामने घटित होता है।

ग्राम प्रधान खुशी दास का आभार जताना महज़ औपचारिकता नहीं था—गांव में ऐसे आयोजन तभी सफल होते हैं जब स्थानीय नेतृत्व उसे अपना कार्यक्रम मान ले। और जब एक ही दिन हरिद्वार और रुड़की की 10 ग्राम पंचायतों में शिविर लगे और जुलाई से अब तक कुल 59 हो जाएं, तो यह संख्या नहीं, बल्कि रफ्तार का पैमाना है।

बेशक डिजिटल साक्षरता और सुरक्षित बैंकिंग प्रथाओं पर चर्चा जितनी जरूरी है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी—क्योंकि ऑनलाइन ठग गांव के मोबाइल तक भी पहुंच चुके हैं। एसबीआई आने वाले हफ्तों में और गांवों में कैंप लगाने की योजना बना रहा है, और अगर यह निरंतरता बनी रही तो यह सिर्फ बैंकिंग नेटवर्क नहीं, बल्कि भरोसे का नेटवर्क भी बुन देगा। यह भरोसा ही वह असली करेंसी है, जो गांव से शहर तक एकसमान चलती है।

Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई