
उत्तर प्रदेश में पुलिस वर्दी के साथ जुड़ी एक खास पहचान होती है—कहीं वह सिर्फ कानून की किताब में दर्ज सख्ती होती है, तो कहीं वह अपराधियों के लिए असली ‘कायदा’ बन जाती है। आईपीएस अजय कुमार साहनी उसी दूसरी श्रेणी के अफसर हैं, जिनके नाम पर सुनकर कई ‘मोस्ट वॉन्टेड’ की नींद उड़ जाती है और बाकी अपराधी गूगल पर “नज़दीकी राज्य में ठिकाना” सर्च करने लगते हैं। 52 एनकाउंटर का आंकड़ा कोई मामूली उपलब्धि नहीं है; यह उतना ही दुर्लभ है जितना दिल्ली की सर्दी में समय पर चलने वाली ट्रेन।
तीसरी बार राष्ट्रपति वीरता पदक मिलना सिर्फ मेडल का इजाफा नहीं, बल्कि यह साफ संकेत है कि अपराधियों के लिए यूपी में ‘रियायती टिकट’ अब भी बंद है। अजय साहनी का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि उनके लिए अपराधी सिर्फ चार्जशीट पर दर्ज नाम नहीं, बल्कि ऐसे ‘प्रोजेक्ट’ होते हैं जिन्हें हर हाल में क्लोज करना है। और ‘क्लोज’ का मतलब यहां अदालत की तारीखें नहीं, बल्कि मैदान में अंतिम पन्ना पलटना है।
इस पर तंज भी बनता है—जब बाकी अफसर अपनी सर्विस फाइल में “कमीटी मीटिंग” और “इंस्पेक्शन रिपोर्ट” भरते हैं, साहनी अपनी फाइल में 52 ‘फाइनल रिपोर्ट’ जमा कर चुके हैं, वो भी सीधे मौके से। आलोचक भले इसे ‘एनकाउंटर कल्चर’ कहें, लेकिन जिस प्रदेश में अपराधी कभी-कभी खुद वीडियो जारी करके चुनौती देते हैं, वहां ऐसे अफसर का होना जनता के लिए पुलिस की असली परिभाषा है।
साहनी की यह तीसरी राष्ट्रपति पदक वाली उपलब्धि शायद उनके करियर का अंत नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला एक मील का पत्थर है कि अपराधियों के खिलाफ लड़ाई में अब भी ऐसे चेहरे मौजूद हैं जो फाइलों से ज्यादा फील्ड पर भरोसा करते हैं। और अपराधियों के लिए संदेश सीधा है—अगर इलाके में अजय साहनी का ट्रांसफर हो जाए, तो अपना लोकेशन शेयर करना बंद कर दें… वरना पुलिस का GPS उनसे ज्यादा तेज चलता है।








