सीएम धामी के भरोसेमंद अफसर का असर — दून अस्पताल में निरीक्षण नहीं, सिस्टम की जागृति दिखी

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दून अस्पताल का आज का नजारा कुछ अलग था—एकदम चुस्त, चौकन्ना और चमकदार। वजह साफ थी, स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार खुद पहुंचे थे। जैसे ही उनकी गाड़ी अस्पताल के गेट पर रुकी, वहां की फाइलें भी शायद खुद-ब-खुद सीधी लाइन में खड़ी हो गईं। दीवारों का रंग थोड़ा और ताजा लग रहा था, और झाड़ू शायद आज अपने रिकॉर्ड समय में चली होगी।

डॉ. राजेश कुमार वैसे तो सिस्टम के जानकार अफसर हैं, लेकिन आज उनका निरीक्षण “चेकलिस्ट” से ज्यादा “दिल से” होता दिखा। मरीजों से सीधे बात की, किसी को आयुष्मान कार्ड बनवाया, किसी को बेड दिलवाया—यह सब देखकर स्टाफ के चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आई जो केवल “उच्च अधिकारियों की उपस्थिति” में खिलती है।

उन्होंने साफ-सफाई पर जोर दिया, रंगाई-पुताई की बात की—यानी अस्पताल को न सिर्फ ठीक करना है, बल्कि दिखना भी ठीक-ठाक चाहिए। और डॉक्टरों से कहा कि जो अच्छा काम कर रहे हैं, उनके नाम बताओ, उन्हें सम्मानित करेंगे। यह सुनकर कुछ डॉक्टरों ने मन ही मन सोचा होगा—“अब मेहनत का इनाम भी मिल सकता है, सिर्फ ड्यूटी का बोझ नहीं।”

सबसे दिलचस्प पल था जब उन्होंने हिमाचल से आए मरीज को तुरंत आयुष्मान कार्ड बनवाकर भर्ती कराया। यह कदम सिर्फ “फाइलों में संवेदनशीलता” नहीं, बल्कि मैदान पर मानवता जैसा था।

डायलिसिस यूनिट में तीन शिफ्ट में काम देखकर सचिव ने तारीफ की, यानी मानो कह रहे हों—“देखो, सरकारी अस्पताल में भी गति है, बस नीयत और निगरानी दोनों बने रहनी चाहिए।”

वैसे, यह सब देखकर इतना तो तय है कि डॉ. राजेश कुमार केवल सचिव नहीं, बल्कि सीएम धामी के भरोसेमंद ‘फील्ड कमांडर’ हैं—जो न फाइलों से डरते हैं, न धरातल से भागते हैं। उनकी शैली में “सिस्टम को जगाना” भी है और “लोगों को भरोसा दिलाना” भी।

अस्पताल के गलियारों में आज जो हलचल थी, वो सिर्फ एक औचक निरीक्षण नहीं था—वो एक संकेत था कि उत्तराखंड का स्वास्थ्य तंत्र अब फाइलों की धूल झाड़कर सेवा के नए रंग में रंगने जा रहा है।
और अगर यह रफ्तार बनी रही, तो मरीज ही नहीं, सिस्टम भी जल्द ही ठीक हो जाएगा।

Khushi
Author: Khushi

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