

बरसात थमते ही जब ज़्यादातर दफ्तरों में अभी भी “फाइलें सुखाने” की प्रक्रिया चल रही थी, तब देहरादून जिला प्रशासन ने बटोली गांव तक सड़क पहुंचा दी — वो भी सिर्फ 7 दिन में। सुनने में यह उतना ही अविश्वसनीय लगता है जितना किसी सरकारी कार्य का “समय पर” पूरा होना। पर इस बार कहानी अलग है।
डीएम सविन बंसल ने यह दिखा दिया कि “सरकार जनता की है” सिर्फ नारेबाज़ी नहीं, बल्कि ज़मीन पर भी संभव है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की संवेदनशीलता और त्वरित रिस्पांस वाली शैली का असर अब ज़िले के अफसरों के काम में भी झलकने लगा है।
बटोली, जो कभी “खाई युक्त टीला” कहलाता था, अब फिर से “रास्ता” कहलाने लगा है। यह वही जगह थी जहां अतिवृष्टि ने सब कुछ उखाड़ दिया था — सड़क, बिजली, पानी और उम्मीदें तक। लेकिन डीएम बंसल ने जब खुद गांव पहुंचकर कहा था “समाधान करेंगे”, तब गांववालों ने शायद सोचा होगा — “कहने में क्या जाता है।” पर अब सड़क गांव में है, बिजली के खंभे सीधा खड़े हैं, और पानी की मोटी पाइपलाइन में आवाज़ आ रही है — विकास की।
दिलचस्प यह है कि जहां दूसरे ज़िलों में “टेंडर प्रक्रिया” की फाइलें अब तक नोटिंग ढूंढ रही होंगी, वहीं यहां काम बजट जारी से लेकर साइट पर मशीनरी तक रिकॉर्ड टाइम में पहुंच गया। युद्धस्तर पर काम हुआ, लेकिन यह “युद्ध” जनता की उम्मीदों के लिए था, किसी कागजी रूटीन के लिए नहीं।
और हाँ, प्रशासन ने इतना ही नहीं किया — स्वास्थ्य विभाग को भी मौके पर भेज दिया। एएनएम ने गर्भवती महिलाओं का परीक्षण किया, बच्चों का टीकाकरण हुआ, यानी राहत सिर्फ सड़कों तक नहीं, जीवन तक पहुंचाई गई।
अब बटोली के लोग जब अपनी सड़क पर वाहन चलते देख रहे हैं, तो उन्हें समझ आ रहा है कि “प्रशासन” केवल नोटिस जारी करने वाला शब्द नहीं होता, बल्कि जब चाहे “प्रथम रिस्पांडर” भी बन सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा व्यंग यही है कि जहाँ सरकारों की योजनाओं का उद्घाटन अक्सर पत्थर पर होता है, यहाँ काम का उद्घाटन सड़क की मिट्टी में हुआ है।
डीएम बंसल का यह रिकॉर्ड सिर्फ फाइलों में नहीं, बल्कि बटोली के हर घर के दरवाजे तक खुद चलकर गया है।
यानी इस बार प्रशासन ने सड़क नहीं बनाई — विश्वास की डामर बिछाई है।








