
देवभूमि उत्तराखंड का यह अवसर सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि 25 वर्षों की उस यात्रा का उत्साह है जिसने पहाड़ से प्रदेश बनने तक का सफर तय किया। आज जब राज्य अपनी रजत जयंती के दहलीज पर खड़ा है, तो यह सिर्फ जश्न का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का भी क्षण है। राजधानी देहरादून इस गौरवमय इतिहास की साक्षी बनने जा रही है, जहां राष्ट्रपति मुर्मू और प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति इस उत्सव को राष्ट्रीय गौरव का रूप देने वाली है।
जिलाधिकारी सविन बंसल का सटीक प्रबंधन और सख्त अनुशासन इस ऐतिहासिक आयोजन को अनुकरणीय बनाने की तैयारी में है। बंसल की बैठक सिर्फ औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक मैराथन रणनीति बैठक थी — जहां उन्होंने हर व्यवस्था को सिरे से देखा और किसी भी प्रकार की ढिलाई पर शून्य सहनशीलता का संकेत दिया। उनके निर्देशों में वह प्रशासनिक कठोरता भी झलकी जो किसी उत्सव को सफल आयोजन में बदल देती है।
रजत जयंती पर उत्तराखंड अपने अतीत की झलक, संस्कृति की झंकार और आधुनिक विकास की चमक एक साथ दिखाएगा। यह वही उत्तराखंड है जिसके निर्माण की मांग कभी संघर्षों और बलिदानों की गूंज में उठी थी, और आज वही धरती विकास और नई दिशा की मिसाल पेश कर रही है। जिलाधिकारी का यह आदेश कि राज्य के स्थापना संग्राम से लेकर आधुनिक उपलब्धियों तक की झांकी तैयार की जाए, इस आयोजन को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि जनता की भागीदारी का पर्व बना देगा।
सविन बंसल ने जो मापदंड तय किए हैं — चाहे वह रूट चार्ट की माइक्रो प्लानिंग हो, सेक्टरवार जिम्मेदारी हो या सुरक्षा व स्वास्थ्य इंतज़ाम — उससे स्पष्ट है कि यह उत्सव केवल तामझाम नहीं बल्कि सुचारु प्रशासनिक अनुशासन का नमूना बनेगा। देहरादून प्रशासन का फोकस इस बार केवल सजावट पर नहीं, बल्कि उस भावना पर है जो उत्तराखंड के गौरव को जीवित रखे।
रजत जयंती महोत्सव में जब लोक संस्कृति के रंग बिखरेंगे, जब राज्य के विकास की उपलब्धियां प्रदर्शित होंगी, और जब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री मंच साझा करेंगे — तब यह उत्सव देवभूमि की उस आत्मा को अभिव्यक्त करेगा जिसने कठिनाइयों से उभरकर पहचान बनाई है। यह सिर्फ 25 साल का उत्सव नहीं, बल्कि “नए उत्तराखंड” का उद्घोष होगा।
देहरादून प्रशासन की तैयारियों में झलक रहा है कि यह रजत जयंती एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखंड के गौरव, संस्कृति और संकल्प का स्वर्णिम अध्याय बनने जा रही है।








