
देहरादून का आढ़त बाजार, जो कभी परंपरा और पुराने व्यापारिक ढांचे का प्रतीक था, अब विकास की नई परिभाषा गढ़ने जा रहा है। एमडीडीए द्वारा आरंभ की गई पुनर्विकास परियोजना केवल ईंट-पत्थर का बदलाव नहीं, बल्कि शहर की आत्मा को नया रूप देने का प्रयास है। सचिव मोहन सिंह बर्निया के नेतृत्व में हुई समीक्षा बैठक से स्पष्ट है कि यह योजना योजनाबद्ध, पारदर्शी और व्यवहारिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ रही है। रजिस्ट्री प्रक्रिया शुरू करने से लेकर स्वयं ध्वस्तीकरण की शपथ तक — हर निर्णय यह दर्शाता है कि एमडीडीए केवल कागज़ी काम नहीं कर रहा, बल्कि जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के लिए गंभीर है।
इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें परंपरा को तोड़ा नहीं जा रहा, बल्कि उसे आधुनिकता के साथ जोड़ा जा रहा है। मोहन सिंह बर्निया की सोच यही है कि आढ़त बाजार अपनी ऐतिहासिक पहचान को बरकरार रखते हुए सुविधा, स्वच्छता और सौंदर्य का उदाहरण बने। यह दृष्टिकोण बताता है कि विकास का मतलब केवल ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि उस क्षेत्र की आत्मा को बचाकर उसमें नई जान फूंकना भी है।
उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी का विजन इस परियोजना में स्पष्ट झलकता है। उनका मानना है कि देहरादून जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील शहर में विकास तभी सार्थक है जब उसमें जनसहभागिता, न्यायसंगत प्रक्रिया और पारदर्शिता शामिल हो। यही वजह है कि उन्होंने इसे राज्य की सर्वश्रेष्ठ शहरी पुनर्विकास परियोजना बनाने का लक्ष्य रखा है। तिवारी की सोच केवल योजनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि जनता के जीवन स्तर को बेहतर बनाने तक जाती है। उनका दृष्टिकोण विकास को “जन-हित के केंद्र” में रखता है — जहाँ हर कदम नागरिकों की सुविधा, व्यापारी वर्ग की सुरक्षा और शहर के सांस्कृतिक चरित्र की रक्षा के लिए उठाया जा रहा है।
देहरादून की पहचान को नई दिशा देने वाला यह प्रयास बताता है कि एमडीडीए सिर्फ निर्माण संस्था नहीं, बल्कि शहर के भविष्य की योजना बनाने वाली संवेदनशील इकाई बन चुकी है। बंशीधर तिवारी और मोहन सिंह बर्निया जैसे अधिकारी न केवल योजनाओं को गति दे रहे हैं, बल्कि उनमें संवेदना और प्रतिबद्धता का समावेश कर रहे हैं। यही कारण है कि आढ़त बाजार पुनर्विकास परियोजना, राज्य के शहरी विकास की दिशा में एक मिसाल बनने की ओर अग्रसर है।








