
देहरादून की धरती एक बार फिर उस बात को साबित कर रही है कि ज्ञान का असली मंदिर विश्वविद्यालयों की दीवारों में नहीं, बल्कि उन लोगों के भीतर बसता है जो विज्ञान को समाज की सेवा का माध्यम बना लेते हैं। ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. नरपिंदर सिंह का यूनेस्को की द वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (TWAS) का फेलो चुना जाना सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं—यह उस सोच की जीत है जो प्रयोगशाला से निकलकर खेतों, रसोईघरों और उद्योगों तक पहुंचती है।
वैज्ञानिकों के बीच यह फेलोशिप “नोबेल प्री-स्कूल” कही जाती है, क्योंकि यह उन लोगों को पहचानती है जो संसाधनों की कमी के बावजूद कल्पना और शोध की समृद्धि से दुनिया को दिशा देते हैं। और डॉ. सिंह उसी परंपरा के वैज्ञानिक हैं—जो चमकती प्रयोगशालाओं से नहीं, बल्कि सीरियल साइंस और फूड केमिस्ट्री जैसे जमीनी विज्ञान से विश्व पटल तक पहुंचे हैं।
व्यंग्य यह है कि जहां आमतौर पर “फूड” शब्द सुनते ही लोगों के दिमाग में सिर्फ टेस्ट आता है, वहीं डॉ. नरपिंदर सिंह ने साबित किया कि खाना सिर्फ स्वाद नहीं, विज्ञान भी है। उन्होंने स्टार्च और डाइटरी फाइबर की संरचना से लेकर फंक्शनल फूड कंपोनेंट्स की इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन तक वह रास्ता खोला, जिससे अब पोषण और उद्योग दोनों की परिभाषा बदल रही है।
उनके नाम के आगे अब सिर्फ “वीसी” नहीं लिखा जाएगा—अब “वर्ल्ड साइंस फेलो” का दर्जा भी जुड़ गया है। और गौर करने वाली बात यह है कि यह सम्मान किसी विदेश यात्रा, पीआर टीम या चमकदार प्रचार से नहीं मिला, बल्कि तीन दशक की वैज्ञानिक साधना से हासिल हुआ है।
सकारात्मक यह है कि देहरादून जैसे शहर में बैठे एक भारतीय वैज्ञानिक ने यह दिखाया कि “विकासशील देश” अब विकास के प्रयोगशाला बन सकते हैं। डॉ. सिंह ने यह प्रमाणित किया कि विज्ञान तब सबसे ज़्यादा उपयोगी होता है, जब वह समाज की ज़रूरतों से जुड़ता है।
उनका यह कथन—कि यह उपलब्धि उनके विद्यार्थियों और सहयोगियों की मेहनत का परिणाम है—उनकी विनम्रता और नेतृत्व की परिपक्वता दोनों का उदाहरण है। असली वैज्ञानिक वही होता है जो श्रेय साझा करता है, और यही उन्हें असाधारण बनाता है।
आज जब कई संस्थान “रैंकिंग” और “रिपोर्ट” के पीछे दौड़ रहे हैं, डॉ. नरपिंदर सिंह ने अपनी रिसर्च की रोटी इतनी सधी हुई आँच पर सेंकी है कि उसकी खुशबू अब अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच चुकी है। यह सिर्फ देहरादून नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का क्षण है—जहाँ विज्ञान अब पश्चिम की प्रयोगशालाओं से नहीं, हिमालय की घाटियों से भविष्य लिख रहा है।








