
देहरादुन,लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता भावनाओं के शोर में नहीं, बल्कि तथ्यों की रोशनी में खड़ी रहती है। धामी सरकार ने वही किया काम किया, कार्रवाई की और कानून को अपना रास्ता तय करने दिया। लेकिन दिक्कत यह रही कि कुछ पेशेवर आक्रोशियों को यह ठहराव रास नहीं आया। उनकी मंशा सरकार गिरानी थी, सिस्टम को बदनाम करना था और भीड़ के कंधे पर बंदूक रखकर सियासी शिकार खेलना था।
व्यंग्य देखिए जो लोग खुद हिस्ट्रीशीटर रहे, वही लोकतंत्र के शिक्षक बन बैठे। जिन्हें कानून से सबसे ज्यादा डर होना चाहिए, वही कानून के नाम पर चंदा काटते घूमे। “न्याय दिलाएंगे” का नारा इतना उछाला गया कि सच पीछे छूट गया। जबकि हकीकत यह है कि पूरे प्रकरण में पुलिस की कार्रवाई से लेकर कानूनी पैरवी तक, धामी सरकार हर कदम पर खड़ी रही। न दबाव में आई, न सौदेबाजी की, न ही भीड़ के शोर से डरी।
तंज यह है कि एक अदाकारा और उसका पति खुद को जनभावनाओं का प्रतिनिधि घोषित कर, पर्दे के पीछे सरकार गिराने की मंशा से पटकथा लिखते रहे। मंच सड़क था, स्क्रिप्ट भावनात्मक थी और टिकट जनता की जेब से कटा। जब सच सामने आया, तो वही लोग सवालों से भागते नजर आए। जिनके हाथ में मोमबत्ती थी, अब वही अंधेरे में सच्चाई से मुंह छुपा रहे हैं।
धामी सरकार की सबसे बड़ी “गलती” यही रही कि उसने शोर के आगे घुटने नहीं टेके। कानून को कानून रहने दिया, तमाशा नहीं बनने दिया। और यही बात हिस्ट्रीशीटर गैंग को चुभ गई। क्योंकि जब सरकार मजबूत हो, तो दुकानदारी बंद हो जाती है न चंदा चलता है, न ड्रामा बिकता है।
अब वक्त है जनता के लिए आईना देखने का। सवाल सरकार से कम और खुद से ज्यादा पूछने का है क्या हम फिर किसी सुनियोजित आक्रोश का ईंधन बनेंगे, या विवेक के साथ खड़े होंगे? धामी सरकार खड़ी है, सिस्टम खड़ा है। हिलने वाले वही हैं, जिनकी राजनीति झूठ, शोर और उगाही पर टिकी थी। जागिए, क्योंकि अगली पटकथा फिर तैयार की जा रही है और इस बार भीड़ चाहिए।








