827 शस्त्र लाइसेंस निरस्त54 अतिरिक्त असलहा धारक और 773 यूआईएन विहीन पर डीएम सवीन बंसल की बड़ी कार्रवाई

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उत्तराखंड में अक्सर उत्तराखंडियत शब्द भाषणों में सुनाई देता है लेकिन ज़मीन पर उसका मतलब बहुत कम लोग उतार पाते हैं। देहरादून में जो हुआ उसने पहली बार इस शब्द को फाइलों से निकालकर फैसलों में बदल दिया। यही है बंसल मॉडल। कम बोलो ज़्यादा करो। नाम नहीं नियम चलाओ।
असल में यह कार्रवाई सिर्फ़ शस्त्र लाइसेंस निरस्तीकरण नहीं है। यह उस सोच पर सीधा प्रहार है जिसमें लोग मान बैठे थे कि पहाड़ की शांति देवभूमि की छवि और प्रशासन की नरमी का फायदा उठाकर सब कुछ चलता रहेगा। बंसल ने साफ़ कर दिया कि उत्तराखंड की पहचान नरमी नहीं अनुशासन है। और अनुशासन वही जो सबके लिए बराबर हो।
उत्तराखंडियत का मूल स्वभाव सादगी नियम और सामूहिक जिम्मेदारी रहा है। यहां हथियार परंपरा नहीं मजबूरी रहे हैं। लेकिन जब हथियार स्टेटस सिंबल बनने लगें और लाइसेंस कानून से ऊपर समझा जाने लगे तब वही उत्तराखंडियत खतरे में पड़ती है। बंसल ने ठीक वहीं हस्तक्षेप किया। बिना शोर बिना बयानबाज़ी सीधे कार्रवाई।
एक साथ सैकड़ों लाइसेंस निरस्त करना आसान फैसला नहीं होता। इसके लिए राजनीतिक दबाव सहने की क्षमता चाहिए और सिस्टम के भीतर जमी जड़ता से टकराने का साहस चाहिए। उत्तराखंड में अफसरशाही अक्सर संतुलन के नाम पर फैसले टालती रही है। लेकिन बंसल मॉडल संतुलन नहीं स्पष्टता पर चलता है। जो नियम में नहीं वह सिस्टम में नहीं।
यह मॉडल बताता है कि देवभूमि में कानून को देवी देवताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उसे प्रशासन के हाथों मजबूत करना पड़ता है। यूआईएन जैसे तकनीकी नियम को सख्ती से लागू करना यह साबित करता है कि उत्तराखंड अब भावनाओं से नहीं प्रक्रिया से चलेगा।
सबसे अहम बात यह है कि इस कार्रवाई में कोई चयन नहीं दिखता। न रसूख न पहचान न पुराने लाइसेंस का बहाना। यही उत्तराखंडियत है। जहां व्यक्ति नहीं व्यवस्था बड़ी होती है। जहां पहाड़ की तरह फैसले अडिग होते हैं और नदी की तरह साफ़।
बंसल मॉडल दरअसल एक चेतावनी है और एक रास्ता भी। चेतावनी उन सबके लिए जो सोचते हैं कि नियम सिर्फ़ कागज़ के लिए हैं। और रास्ता उन अफसरों के लिए जो चाहते तो हैं लेकिन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उत्तराखंड में यह करके दिखाया सिर्फ़ बंसल ने। और यहीं से बंसल मॉडल जन्म लेता है।

Khushi
Author: Khushi

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