
खटीमा में लोहड़ी का यह सार्वजनिक समारोह किसी औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक जीवंत अनुभूति बन गया, ऐसी अनुभूति, जिसमें सिख समाज ने अपनेपन को महसूस किया और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उस अपनेपन को पूरे मन से स्वीकार किया। लोहड़ी की अग्नि के समक्ष जब सीएम धामी ने तेल, तिल और मूंगफली अर्पित की, तो वह क्षण केवल परंपरा निभाने का नहीं था, वह क्षण भावनाओं का था, आस्था का था और उस रिश्ते का था जो वर्षों से सिख समाज और धामी के बीच विश्वास के धागे से बुना गया है।
लोहड़ी की लौ सिख परंपरा में सिर्फ गर्मी या उत्सव का प्रतीक नहीं, वह संघर्ष, श्रम और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। उसी लौ के सामने खड़े होकर मुख्यमंत्री का नतमस्तक होना यह बताता है कि यह नेतृत्व किताबों से नहीं, ज़मीन से जुड़ा हुआ है। सिख समाज ऐसे ही नेतृत्व को पहचानता है। जो मंच से नहीं, मन से बात करता है। धामी की आंखों में दिखती आत्मीयता और चेहरे पर झलकता सम्मान इस बात का प्रमाण है कि उनका रिश्ता सिख समाज से कोई नया राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि पुराना अपनापन है।
ऊधमसिंहनगर की धरती विविधताओं से भरी है, लेकिन यहाँ विविधता कभी दूरी नहीं बनती। यही कारण है कि इसे “मिनी भारत” कहा जाता है। इस मिनी भारत में जब कोई मुख्यमंत्री बिना किसी औपचारिकता के लोहड़ी की अग्नि में अर्पण करता है, तो वह संदेश देता है कि सरकार और समाज के बीच कोई दीवार नहीं है। यही संदेश सिख समाज के दिल को छूता है, क्योंकि यहाँ भावनाओं की कीमत शब्दों से ज़्यादा कर्म से आँकी जाती है।
धामी का सिख समाज के प्रति व्यवहार किसी एक दिन का प्रदर्शन नहीं लगता। यह वही निरंतरता है, जो विश्वास को मजबूत करती है। यही वजह है कि खटीमा की इस शाम में सिख समाज ने केवल मुख्यमंत्री को नहीं देखा, बल्कि अपने पुराने हितेषी को महसूस किया, ऐसे हितेषी को, जो पर्वों में साथ खड़ा होता है, परंपराओं में सहभागी बनता है और सम्मान को शब्दों तक सीमित नहीं रखता।
लोहड़ी का यह उत्सव दरअसल एक संवाद था, संस्कृति और संवेदना के बीच, समाज और सत्ता के बीच। जब नेतृत्व इस संवाद को समझ लेता है, तब वह केवल प्रशंसा नहीं, अपनापन पाता है। खटीमा की लोहड़ी ने यही कर दिखाया। यह आयोजन खत्म हो सकता है, लेकिन उसकी गर्माहट लंबे समय तक बनी रहेगी, लोहड़ी की अग्नि की तरह, और उस भरोसे की तरह, जो सिख समाज के मन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए और गहराता चला गया।








