

देहरादून में एक बार फिर यह साबित हुआ कि “बड़ा बैंक” होने से कोई कानून से बड़ा नहीं हो जाता। आईआईएफएल बैंक की इस कार्रवाई ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर बीमित ऋण का पूरा क्लेम मिलने के बाद भी एक विधवा और उसकी दो मासूम बेटियों को किस आधार पर प्रताड़ित किया जा रहा था? क्या यह सिस्टम की खामी थी या फिर मनमानी का अहंकार?
नवाबगढ़ निवासी ज्योति के पति ने वर्ष 2021 में होम लोन लिया, बीमा भी कराया। अगस्त 2023 में हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। बीमा कंपनी ने 14.61 लाख रुपये का क्लेम बैंक को चुका दिया। बावजूद इसके मूल अभिलेख रोके रखना और वसूली एजेंटों के जरिए दबाव बनाना—यह केवल वित्तीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
यहां सवाल सीधा है—जब बीमा क्लेम का उद्देश्य ही ऐसी आपदा में परिवार को राहत देना है, तो फिर बैंक किस आधार पर “शेष देनदारी” का डर दिखा रहा था? क्या आम नागरिक को कानूनी और वित्तीय जटिलताओं की जानकारी न होना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है?
जिलाधिकारी सविन बंसल के संज्ञान में मामला आते ही प्रशासनिक मशीनरी ने जिस तेजी से काम किया, उसने स्पष्ट कर दिया कि शासन केवल कागजों तक सीमित नहीं है। उप जिलाधिकारी न्याय कुमकुम जोशी के नेतृत्व में टीम ने दो लाख रुपये की वसूली “राजस्व वसूली” की तरह बैंक से ही करवा दी। यह संदेश प्रतीकात्मक से कहीं अधिक है—यदि बैंक दबाव बनाएगा तो प्रशासन भी वैधानिक दबाव बनाना जानता है।
व्यंग्य यही है कि जो संस्थान खुद को “फाइनेंशियल डिसिप्लिन” का प्रतीक बताते हैं, उन्हें आखिर प्रशासन से अनुशासन क्यों सीखना पड़ा? क्या वसूली एजेंटों की आक्रामक संस्कृति ने बैंकिंग को सेवा से ज्यादा वसूली उद्योग बना दिया है?
मामले में शाखा पर तालाबंदी, संपत्ति कुर्की जैसी चेतावनी ने यह भी दिखा दिया कि प्रशासन अब “नोटिस भेजकर इंतजार” करने के मूड में नहीं है। खासकर तब, जब मामला महिला, बुजुर्ग या असहाय परिवार से जुड़ा हो।
यह प्रकरण केवल एक परिवार को न्याय दिलाने का नहीं, बल्कि एक बड़े संदेश का है—बीमा क्लेम लेने के बाद भी यदि बैंक आमजन को डराएगा, तो उसे भी कानून के दायरे में खड़ा किया जाएगा। मजबूत बैंक होने का दावा करने वालों को यह समझना होगा कि मजबूती बैलेंस शीट से नहीं, आचरण से साबित होती है।
देहरादून में यह कार्रवाई उन तमाम परिवारों के लिए उम्मीद है, जो बैंक के नोटिस और एजेंटों के फोन से घबराकर चुप हो जाते हैं। अब तस्वीर साफ है—यदि कर्ज बीमित है और क्लेम चुका दिया गया है, तो वसूली नहीं, राहत मिलनी चाहिए। वरना “लाइन पर लाने” के लिए जिला प्रशासन तैयार बैठा है।








