“एक दस्तखत में बदलाव की इबारत: डीएम सविन बंसल ने 14 अनाथ दिव्यांग बालिकाओं को दिलाया सम्मानजनक नया आशियाना

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जब सिस्टम को संवेदनाएं छूती हैं, तब फैसले कागज़ पर नहीं, ज़मीर से लिखे जाते हैं। देहरादून में 14 अनाथ, बौद्धिक अक्षम दिव्यांग बालिकाओं के लिए जब कोई दरवाज़ा नहीं खुला, तब जिलाधिकारी सविन बंसल ने दरवाज़ा तो दूर, दीवार ही गिरा दी। ये सिर्फ पुनर्वास नहीं, प्रशासन की रीढ़ सीधी करने वाला ‘रेफरेंस केस’ है, जिसे पूरे प्रदेश में पढ़ाया जाना चाहिए।

सत्य साईं आश्रम जब बंद होने लगा, तब संस्थाएं आंखें मूंदे बैठीं — सेवा के नाम पर रजिस्ट्रेशन तो लिया, लेकिन सेवा देने से साफ इनकार। शायद उन्हें आदत हो गई है ‘फंड के नाम पर बंद आंखों’ की। लेकिन इस बार, डीएम सविन बंसल का ‘एक स्ट्रोक’ आया और सारा ढकोसला ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।

संस्थाएं सोचती रहीं, “प्रशासन तो चुपचाप संस्तुति कर देगा, दस्तखत कर देगा, और हम अपने एसी दफ्तरों में सेवा का नाटक करते रहेंगे” — लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि इस बार दस्तखत करने वाला अधिकारी ‘आंख’ और ‘आंखरी’ दोनों है।

14 अनाथ दिव्यांग बेटियों के लिए एक भी संस्था एडमिशन को तैयार नहीं — ये समाज के उस चेहरों का पोस्टमार्टम है, जो CSR रिपोर्ट्स में मुस्कानें छापते हैं लेकिन असल में विकलांगता से ग्रस्त बच्चों को अपने आंकड़ों में भी नहीं गिनते। डीएम ने न केवल इस नकाब को उतारा, बल्कि ऐसी तमाम संस्थाओं को आईना भी दिखा दिया:
“फंड चाहिए? तो मानक भी निभाओ। सेवा सिर्फ फॉर्म में नहीं, फील्ड में दिखनी चाहिए।”

बात सिर्फ बेटियों के राफेल होम में ट्रांसफर की नहीं है, बात उस ऐलान की है जो डीएम ने हर कुंभकरण बनी संस्था को किया —
“अब सिर्फ दस्तखत नहीं होगा, अब जवाबदेही भी होगी।”
कभी ‘पंजीकरण’ के नाम पर, तो कभी ‘गांरटी’ के नाम पर, इन संस्थाओं ने फाइलों को हथियार बना रखा था। अब इन हथियारों का मुकाबला संवेदनशीलता और सख्ती के संयुक्त ऑपरेशन से हो रहा है।

इसे देखकर ये कहने का मन होता है —
“बदलाव तब आता है जब कुर्सी पर बैठा अफसर ‘क्लर्क’ नहीं, ‘किरदार’ बन जाए।”

और किरदार भी ऐसा जिसने कहा —
“जो एक दस्तखत करोड़ों की फंडिंग दिला सकता है, वो दस्तखत अब नियम तोड़ने वालों की फंडिंग भी रोक देगा।”

डीएम की इस कार्रवाई में सिर्फ पुनर्वास नहीं, ‘प्रशासनिक पुनर्जन्म’ हुआ है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि ‘सामाजिक न्याय’ किसी मंत्रालय की फाइल नहीं, जमीनी सच्चाई है — और इस सच्चाई से खेलने वालों को अब चेतावनी मिल चुकी है।

अब संस्थाओं के पास दो ही रास्ते हैं —
या तो वे सेवा के नाम पर अपनी दुकानें बंद करें,
या वाकई सेवा करना सीखें।

प्रदेश को चाहिए ऐसे ही अफसर जो हाथ में कानून और दिल में इंसानियत लेकर चलें। ये घटना एक चेतावनी है, एक उदाहरण है, और शायद एक नई शुरुआत भी — जहां सरकारी कुर्सी पर बैठा अफसर सिस्टम का हिस्सा नहीं, सिस्टम का सुधारक बनकर उभरे।

और अंत में, ये सवाल सिर्फ सरकार या समाज से नहीं, खुद से भी पूछिए —
“अगर ये बेटियां आपकी होतीं, तो क्या आप भी रजिस्ट्रेशन और मानकों की आड़ लेकर दरवाज़ा बंद कर देते?”

शुक्र है देहरादून में जवाब ‘ना’ था।
और शुक्र है, वहां डीएम सविन बंसल थे।

Khushi
Author: Khushi

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