
देवबंद की मिट्टी में कुछ हलचल सी है। ऊपर से भले ही सब शांत दिखे, लेकिन भीतर एक राजनीतिक ज्वालामुखी सुलग रहा है। जिन गलियों में पहले जयकारे गूंजते थे, अब वहां फुसफुसाहटें तेज़ हो रही हैं—और ये फुसफुसाहटें धीरे-धीरे नारों का रूप ले रही हैं।
एक ऐसा दौर चल रहा है जहां कोई मंच से खुद को अजेय घोषित करता है—”मैं कहीं जाने वाला नहीं हूं, कई सालों तक यहीं रहूंगा।” ऐसा लगता है जैसे सत्ता अब जनता के भरोसे से नहीं, भाषणों की घोषणा से चलने लगी हो। ज़रा सोचिए, जब कोई नेता खुद को कुर्सी से अचल मानने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन कहां टिकता है?
लेकिन जनता बड़ी समझदार है। वो सब देख रही है, सुन रही है, और सबसे अहम—अब बोलने भी लगी है। क्योंकि बात अब उस “मैं” की नहीं, उस “हम” की हो गई है जो वर्षों तक संघर्ष करता रहा और अब किनारे बैठा सवाल कर रहा है: “कब तक सिर्फ आप ही?”
अभी हाल में एक ऐतिहासिक कार्यक्रम हुआ, जिसमें महाराणा प्रताप की गाथा गूंज रही थी—but irony died a slow death—क्योंकि उस आयोजन में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि तक को आमंत्रित नहीं किया गया। देवबंद की सियासत में इससे बड़ा संदेश और क्या हो सकता है? जब मंचों से बुलावा रुक जाए, तो समझ लीजिए कि जनता का मन भी मुड़ने लगा है।
विरोध अब तटस्थ नहीं रहा। जो कभी जयजयकार करने वाले थे, अब खामोशी से पाले बदल रहे हैं। सलाहकारों की फौज आज भी रेडीमेड है, लेकिन सवाल ये है कि क्या उनकी सलाह जमीनी सच्चाई जानती है या सिर्फ चाटुकारिता की मलाई चाट रही है?
सोशल मीडिया पर ‘फिर से मैं ही’ जैसे अभियान चलवाए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी कार्यकर्ता पूछ रहा है—“क्या ये चुनाव है या आत्ममुग्धता का इश्तिहार?” जनता अब ताली नहीं बजा रही, वो आंखें तरेर रही है।
राजनीति का जनाधार वहां से खिसकता है, जहां सत्ता को आत्ममंथन की नहीं, आत्मप्रचार की लत लग जाती है। और देवबंद की फिज़ा अब यही कह रही है—“जो खुद को अजेय समझता है, अक्सर जनता उसे अदृश्य कर देती है।”
वक़्त है चेतने का, क्योंकि हवा का रुख धीरे-धीरे बदल रहा है। और जब रुख पलटता है, तो सवाल ये नहीं होता कि ‘कौन जाएगा’, सवाल ये होता है कि “कब गया, किसी को पता भी चला?”








