
देश की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने 7 मई को जो राष्ट्रीय मॉकड्रिल का आदेश दिया है, वह न केवल समय की आवश्यकता है बल्कि भविष्य की चुनौतियों के प्रति एक गंभीर तैयारी का संकेत भी है। यह कदम यह स्पष्ट करता है कि भारत अब केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि देश के भीतर हर नागरिक, हर सिस्टम, और हर प्रतिष्ठान को भी सुरक्षित रखना चाहता है।
इस मॉकड्रिल में सबसे पहले हवाई हमले की चेतावनी देने वाला सायरन बजाया जाएगा। यह केवल सायरन नहीं, बल्कि एक अलर्ट सिस्टम की परीक्षा है—क्या हम खतरे की स्थिति में तुरंत और प्रभावी रूप से प्रतिक्रिया दे सकते हैं? इस दौरान आम जनता को यह भी सिखाया जाएगा कि हमले के समय कैसे बचाव किया जाए, कहाँ शरण ली जाए, और कैसे बिना घबराए स्थिति को संभाला जाए। यह मानसिक और व्यवहारिक तैयारी भविष्य में जान बचा सकती है।
एक और अहम हिस्सा है ब्लैकआउट—जब शहर की लाइटें बंद कर दी जाएँगी, तो देखा जाएगा कि नागरिक और संस्थान ऐसी स्थिति में कैसे कार्य करते हैं। यह अभ्यास विशेष रूप से साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की संभावनाओं के बीच बेहद आवश्यक हो गया है। आधुनिक हमले अब केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि नेटवर्क, डेटा और पावर सप्लाई को निशाना बनाकर भी होते हैं।
इसके साथ ही देशभर के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा रणनीति की समीक्षा भी मॉकड्रिल का हिस्सा है। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बिजलीघर, अस्पताल—ये सभी संभावित टारगेट होते हैं, और इनकी सुरक्षा की कसौटी परखना एक दूरदर्शी सोच है।
यह मॉकड्रिल केवल एक औपचारिकता नहीं है। यह एक संदेश है कि भारत किसी भी परिस्थिति में न केवल मुकाबला करने को तैयार है, बल्कि आम नागरिकों को भी उस तैयारी का हिस्सा बना रहा है। यह लोकतांत्रिक सुरक्षा का आदर्श उदाहरण है, जहाँ सरकार और जनता दोनों साझा भागीदारी निभा रहे हैं।
ऐसे अभ्यासों को गंभीरता से लेना और उनमें सक्रिय भागीदारी निभाना हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है। देश की सुरक्षा केवल जवानों की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी दीवार पर टिकी होती है। यह मॉकड्रिल उस दीवार को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण ईंट है।








