
डीजी सूचना बंशीधर तिवारी का वक्तव्य दरअसल आज की मीडिया वास्तविकता का आईना है। उन्होंने न तो सोशल मीडिया को खारिज किया और न ही पारंपरिक पत्रकारिता को श्रेष्ठता के अहंकार में रखा, बल्कि दोनों के बीच के रिश्ते, टकराव और निर्भरता को बेहद संतुलित ढंग से सामने रखा। उनका यह कहना कि कुछेक अखबारों को छोड़कर लगभग सभी अखबार सोशल मीडिया पर आ चुके हैं, अपने आप में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि मीडिया का केंद्र अब एकतरफा नहीं रहा। सूचना का प्रवाह अब केवल प्रिंट की मोनोपॉली नहीं, बल्कि डिजिटल स्पेस का साझा मैदान बन चुका है।
तिवारी का विश्लेषण इस बिंदु पर सबसे ज्यादा गहराता है जब वे अखबार और सोशल मीडिया की तुलना करते हैं। वे इसे विरोध नहीं बल्कि पूरक मानते हैं, लेकिन इसी पूरकता के भीतर छिपी चुनौती को भी बेनकाब करते हैं। सुबह जब अखबार हाथ में आता है, तब तक वही खबरें अखबार की वेबसाइट या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पहले ही चल चुकी होती हैं। नतीजा यह कि पाठक के सामने खबर एक “बासी सूचना” के रूप में आती है। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि प्रिंट पत्रकारिता की विश्वसनीयता, प्रासंगिकता और समयबद्धता पर सीधा सवाल है।
सोशल मीडिया को लेकर तिवारी का सबसे गंभीर और जरूरी सवाल है पत्रकार कौन है? यह प्रश्न आज के दौर में सबसे बड़ा संकट बन चुका है। पारंपरिक पत्रकारिता में पहचान, प्रशिक्षण, जिम्मेदारी और संपादकीय जवाबदेही तय होती है, जबकि सोशल मीडिया में कोई भी व्यक्ति कुछ भी लिख सकता है। आम आदमी के लिए यह तय करना लगभग असंभव हो गया है कि सामने जो लिख रहा है, वह प्रशिक्षित पत्रकार है या केवल व्यूज और लाइक्स की दौड़ में शामिल कोई व्यक्ति। यही अनिश्चितता सोशल मीडिया को सूचना माध्यम से कई बार भ्रम माध्यम में बदल देती है।
जब सोशल मीडिया पर गैर-जिम्मेदार लेखन होता है, बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं और सनसनी को प्राथमिकता दी जाती है, तब वही सोशल मीडिया “शोषण मीडिया” का रूप ले लेता है। तिवारी का यह कथन बेहद तीखा है, क्योंकि यह दोधारी तलवार की तरह है—एक तरफ अभिव्यक्ति की आज़ादी, दूसरी तरफ सामाजिक और व्यक्तिगत नुकसान। इस संतुलन पर चर्चा न होना, दरअसल समस्या को और गहरा करता है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सोशल मीडिया का असर केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और परिवार की संरचना तक को प्रभावित कर रहा है। आज एक ही कमरे में बैठे चार लोग भी एक-दूसरे से संवाद नहीं कर रहे, बल्कि अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन में उलझे हुए हैं। यह दृश्य केवल तकनीकी बदलाव का नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का संकेत है, जहाँ सूचना की अधिकता रिश्तों की कमी में बदलती जा रही है।
तिवारी की स्पीच की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उन्होंने सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान दोनों को समान गंभीरता से रखा। उन्होंने गति, प्रभाव और पहुंच को स्वीकार किया, लेकिन जिम्मेदारी, सत्यापन और नैतिकता की अनदेखी पर चेताया भी। यह भाषण किसी एक माध्यम का पक्ष नहीं लेता, बल्कि मीडिया के बदलते स्वरूप को समझने का विवेकपूर्ण दृष्टिकोण देता है। आज के समय में, जब सूचना सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है, बंशीधर तिवारी का यह विश्लेषण मीडिया जगत के लिए आत्ममंथन का अवसर है—कि तेज होना जरूरी है, लेकिन सच्चा और जिम्मेदार होना उससे भी ज्यादा जरूरी।








