उत्तराखंड की नौकरशाही में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या प्रशासन वास्तव में आम आदमी की चौखट तक पहुँच पा रहा है या नहीं। लेकिन देहरादून में जिलाधिकारी सवीन बंसल जिस तरह जनता दर्शन को एक प्रभावी मंच बना रहे हैं, उसने प्रशासन की उस पारंपरिक छवि को तोड़ने का काम किया है जिसमें अधिकारी जनता से दूर दिखाई देते थे। अब हालात यह हैं कि फरियादी सीधे जिलाधिकारी के सामने अपनी समस्या रखते हैं और कई मामलों में उसी समय समाधान भी मिल जाता है। यही वजह है कि देहरादून कलेक्ट्रेट में जनता दर्शन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि न्याय और राहत का तत्काल मंच बनता जा रहा है।
170 शिकायतों के बीच जिस तरह से अलग-अलग मामलों में जिलाधिकारी ने त्वरित और मानवीय निर्णय लिए, वह यह दर्शाता है कि प्रशासनिक संवेदनशीलता क्या होती है। आर्थिक तंगी के कारण परीक्षा से वंचित हो रही छात्रा की फीस प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा से जमा कराने का निर्णय हो या दुर्घटना में घायल व्यक्ति को रायफल फंड से मदद और वृद्धावस्था पेंशन की तत्काल स्वीकृति—ये फैसले यह संकेत देते हैं कि प्रशासन केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहना चाहता। असल प्रशासन वही है जो संकट में खड़े व्यक्ति को समय पर सहारा दे सके।
एक ओर सामाजिक संवेदनशीलता दिखी तो दूसरी ओर प्रशासनिक कठोरता भी साफ दिखाई दी। जब एक बुजुर्ग पिता ने अपने ही बेटे की गुंडागर्दी की शिकायत की, तो जिलाधिकारी ने बिना देरी के गुंडा एक्ट में कार्रवाई का निर्देश दिया। इसी तरह बहू द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे बुजुर्ग दंपति के मामले में भरण-पोषण अधिनियम के तहत वाद दर्ज कराया गया। यह संदेश साफ है कि देहरादून प्रशासन के लिए कानून और व्यवस्था केवल शब्द नहीं बल्कि लागू होने वाली सच्चाई है।
ग्रामीण समस्याओं के प्रति भी जिलाधिकारी का रुख उतना ही सक्रिय दिखाई देता है। चकराता क्षेत्र में वर्षों से लंबित नहर क्षति और मलबे के मामले में पीएमजीएसवाई अधिकारियों से मौके पर ही निस्तारण की तिथि लिखवाना यह बताता है कि अब प्रशासनिक ढिलाई को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी तरह एक विधवा महिला का भारी पेयजल बिल सटलमेंट कर उसे जिला प्रशासन के रायफल फंड से भुगतान कराने का निर्णय भी यह दर्शाता है कि प्रशासन जरूरतमंद के लिए केवल नियमों का ढांचा नहीं बल्कि सहारा भी बन सकता है।
दरअसल मुख्यमंत्री धामी लगातार “जन सेवा और त्वरित प्रशासन” की जो बात करते हैं, देहरादून में उसकी झलक साफ दिखाई देती है। जिलाधिकारी सविन बंसल की कार्यशैली उस मॉडल को जमीन पर लागू करती हुई दिख रही है जिसमें प्रशासन जनता के पास जाता है, उनकी समस्याएं सुनता है और समाधान की दिशा में तुरंत कदम उठाता है।
आज जब देशभर में प्रशासनिक तंत्र पर अक्सर सुस्ती और संवेदनहीनता के आरोप लगते हैं, ऐसे समय में देहरादून का यह मॉडल अलग दिखाई देता है। यहां जनता दर्शन में उमड़ती भीड़ केवल शिकायतों का आंकड़ा नहीं बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है जो लोगों को जिलाधिकारी के निर्णयों पर है। यही भरोसा किसी भी प्रशासनिक अधिकारी की सबसे बड़ी पूंजी होता है।
स्पष्ट तौर पर देखा जाए तो सविन बंसल की कार्यशैली उन्हें केवल एक जिलाधिकारी नहीं बल्कि एक सक्रिय प्रशासक के रूप में स्थापित करती है। त्वरित निर्णय, मानवीय दृष्टिकोण और प्रशासनिक सख्ती—इन तीनों का संतुलन ही किसी अधिकारी को मजबूत बनाता है। देहरादून में यह संतुलन फिलहाल दिखाई दे रहा है और इसी वजह से सविन बंसल को प्रदेश के सबसे प्रभावशाली और मजबूत जिलाधिकारियों में गिना जाने लगा है।








